...सभना जीआ इका छाउ

श्री गुरु नानक देव जयंती कल

...सभना जीआ इका छाउ

जसबीर केसर

भारतीय इतिहास के जिस दौर में श्री गुरु नानक देव जी का आगमन हुआ, वह सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तौर पर बड़ी उथल-पुथल वाला था। वह सामंती युग था और छोटी-छोटी रियासतों के मालिक आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। भारत पर लोधी वंश के राज का वह आखिरी वक्त था। सामाजिक स्थिति अराजकता की तरफ बढ़ रही थी और आम आदमी का जीवन दिन-प्रतिदिन दूभर होता जा रहा था। छुआछूत का बोलबाला था। कर्म-कांड, वहम, भ्रम धर्म को एक जटिल प्रक्रिया बना रहे थे। न्याय व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी थी। आम आदमी की स्थिति चिंतनीय थी।

ऐसे समय में गुरु नानक देव जी का जन्म होता है। 1469 ईस्वी में पंजाब के एक गांव तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में एक साधारण ग्रामीण परिवार में महता कल्याण चंद और माता तृप्ता देवी के घर वह जन्मे। साधारण बालक की तरह उनका पालन-पोषण शुरू हुआ। गुरु नानक बचपन से ही चैतन्य बुद्धि वाले थे। उनके बचपन के साथ कुछ अलौकिक कथाएं जुड़ी हैं पर हम इनकी तरफ न जाकर सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि गुरु नानक साहिब कुदरती तौर पर प्रबुद्ध, चैतन्य और अद‍्भुत प्रतिभा के मालिक थे। इसी प्रतिभा के कारण वह आगे चलकर अपने समय के समाज के अगुआ के रूप में उभरे और युग-पुरुष कहलाये।

गुरु साहिब की शख्सियत में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, सामाजिकता और काव्यात्मकता का अद‍्भुत संगम मिलता है। इसके साथ ही वह मानवता के सच्चे मसीहा और क्रांतिकारी अगुआ के रूप में उभरे।

गुरु नानक देव की विचारधारा और उपदेश को समझने के लिए हमें उनकी रची बाणी का अध्ययन करना होगा। यह बाणी अपने मूल रूप में एक दार्शनिक महाकाव्य रचना है। किसी भी महाकाव्य रचना में उस समय का इतिहास, दर्शन और सामाजिक यथार्थ एक ऐसे ताने-बाने में बुना होता है कि इन्हें अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता। अपने युग के राजनीतिक यथार्थ का चित्रण गुरु नानक देव इस तरह करते हैं-

कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ॥ कूड़ु अमावस सचु चंद्रमा दीसै नाही कह चड़िआ॥ हउ भालि विकुंनी होई॥ आधेरै राहु न कोई ॥

अर्थात, राजा कसाई हैं और उन्होंने झूठ की छुरी हाथ में पकड़ी हुई है, धर्म पंख लगाकर उड़ गया है, सब तरफ झूठ की अमावस का अंधकार पसरा है, सत्य रूपी चंद्रमा कहीं नहीं दिखता। इस अंधेरे में मुझे कोई राह नहीं मिल रहा, मैं ढूंढ़-ढूंढ़ कर बेहाल हो गया हूं।

यहां सत्य की तलाश में भटकती बेहाल जनता की तरफ संकेत है। इस युग को गुरु नानक ने कलयुग का नाम दिया है, जिसके रथ को अग्नि अर्थात गुस्सा, झूठ, हवस का रथवान चला रहा है- कलजुगि रथु अगनि का कूड़ु अगै रथवाहु॥

उस समय उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन अपने शिखर पर था और गुरु नानक समेत अन्य भक्त इसके समर्थक थे। भक्ति आंदोलन के मुख्य मनोरथ थे- सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करना, ईश्वर की भक्ति को इंसान के जीवन का आदर्श मानना, कर्मकांड-छुआछूत का विरोध करना। भक्ति आंदोलन के सभी समर्थक एक ईश्वरवादी थे और सभी मनुष्यों को एक जैसा समझते थे। गुरु नानक देव जी ने कहा- फकड़ जाती फकड़ नाउ॥ सभना जीआ इका छाउ॥

गुरु नानक देव जी ने यह स्पष्ट किया कि वह समाज में नीच समझे जाने वाले दलित व दमित लोगों के साथ खड़े हैं। उनके हित निश्चय ही कमजोर व दुखी लोगों के साथ जुड़े हैं- नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस॥

अपने विचारों के प्रचार के लिए गुरु नानक देव जी हिंदुस्तान और इसके बाहर कई जगह गये। उनके इस सफर को ‘उदासियां’ कहा जाता है। वे अलग-अलग जगह जाकर विभिन्न धर्मों के लोगों व अगुवाओं के साथ संवाद करते और उन्हें अपनी दलीलों के साथ कायल करते। इस सफर में उनके दो साथी उनके साथ होते- बाला और मर्दाना। अध्यात्मवादी गुरु नानक का क्रांतिकारी रूप तब सामने आता है जब वह राजाओं को शेर और वजीरों को कुत्ता कहते हैं- राजे सीह मुकदम कुत्ते॥

1526 में जब बाबर ने हिंदुस्तान पर हमला किया, तब गुरु नानक ने उसे ललकारा और उसकी फौज को ‘पाप की जंज’ कहा। पाप की जंज लै काबलहु धाइआ जोरी मंगै दानु वे लालो ॥

बाबर को ही नहीं उन्होंने हिंदुस्तान के राजाओं को भी दोषी ठहराया और उन्हें ‘कुत्ता’ व ‘मुर्दा’ जमीर वाले कहा, जिन्होंने हिंदुस्तान रूपी रत्न को नहीं सभाला।

इन विचारों से गुरु नानक देव जी की राजनीतिक चेतनता का पता चलता है और यह भी कि एक सच्चा फकीर समाज के हर कोने में हो रहे अत्याचार के प्रति सजग होता है और उसके खिलाफ आवाज बुलंद करने, विरोध करने की हिम्मत रखता है। यही कारण था कि गुरु नानक की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए उनके नौ उत्तराधिकारियों ने मुगल सल्तनत के अत्याचारों का विरोध जारी रखा।

किरत करो... 

गुरु नानक देव जी ने समाज को संदेश दिया- किरत करो, नाम जपो, वंड छको। कर्म करने वाला मेहनती व्यक्ति ही सच्चा इंसान हो सकता है। ऐसा व्यक्ति ही दो वक्त की रोटी कमा-खाकर परमात्मा का आभार जता सकता है। ऐसा इंसान ही किसी जरूरतमंद की मदद कर सकता है। इसलिए वह सत्य की राह पर चलकर सृष्टि के अंतिम सत्य तक पहुंच सकता है-

घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥ नानक राहु पछाणहि सेइ॥

किसी दूसरे का हक मारकर माया इकट्ठी करने वाला व्यक्ति घोर अपराधी है। पाप कमाकर जमा की गयी माया मरने के बाद यहीं पर रह जाती है- इसु जर कारणि घणी विगुती इनि जर घणी खुआई ॥ पापा बाझहु होवै नाही मुइआ साथि न जाई ॥

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