एकदा

कवि की करुणा

कवि की करुणा

एक बार धारा नगरी के एक बस्ती के मकानों में आग लग गई। महाराजा भोज पता लगते ही वहां पहुंचे। एक मकान में आग से घिरे दो बच्चों की चीत्कार सुनकर वे द्रवित हो उठे। उन्होंने देखा कि उनके पास खड़े कवि माघ ने छलांग लगाई तथा मकान के अंदर जा पहुंचे। देखते ही देखते वे दोनों बच्चों को गोदी में लेकर बाहर की ओर दौड़े। बच्चे तो बच गए परंतु माघ का शरीर आग से झुलस गया। महाराजा भोज ने कवि माघ के समक्ष नतमस्तक होकर कहा, ‘कविवर अभी तक तो मैं तुम्हारे काव्य का ही प्रशंसक था आज मुझे पता लगा है कि तुम तो दया और करुणा की साक्षात‍् मूर्ति भी हो। मुझे तुम जैसी महान विभूति पर गर्व है।’

प्रस्तुति : मुकेश शर्मा

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