एकदा

सरल राह

सरल राह

एक डाकू रोज डाका डालता, मगर इस जीवन से परेशान हो गया। वह गुरुनानक के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला, ‘महाराज! मैं अपने जीवन से तंग आ गया हूं। आप ही मुझे कोई मार्ग बताइए, जिससे मैं इस बुराई से बच सकूं।’ नानक बोले, ‘इसमें कौन-सी बड़ी बात है? तुम बुराई करना छोड़ दो तो उससे बच जाओगे। डाकू बोला, ‘अच्छी बात है मैं कोशिश करूंगा।’ थोड़े दिन बाद वह पुन: लौटकर गुरुनानक के पास आया और बोला, ‘गुरुजी! मैंने बुराई को छोड़ने का बहुत प्रयास किया, किंतु नहीं छोड़ पाया। मुझे और कोई उपाय बताएं।’ नानक ने कहा, ‘ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, किंतु रोज के रोज उसे दूसरे लोगों से कह दो। डाकू बहुत प्रसन्न हुआ कि अब वह बेधड़क डाका डालेगा और दूसरों से कहकर मन हल्का कर लेगा। कुछ दिन बीतने पर वह फिर गुरुनानक के पास पहुंचा और बोला, ‘गुरुजी! बुरा काम करना जितना मुश्किल है, उससे कहीं अधिक मुश्किल है दूसरों के सामने अपनी बुराइयों को कहना। इसलिए दोनों में से मैंने आसान रास्ता चुना है। डाका डालना ही छोड़ दिया है।

प्रस्तुति : जयगोपाल शर्मा 

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