पटेल को कमान

भाजपा के एक तीर से कई निशाने

पटेल को कमान

विजय रूपाणी के इस्तीफे के बाद गुजरात में नये नेतृत्व को लेकर लगाये जा रहे कयास रविवार को तब खत्म हो गये जब गांधीनगर में विधायक दल की बैठक में भूपेंद्र पटेल को नेता चुना गया। वे जल्दी ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के करीबी माने जाने वाले भूपेंद्र पटेल उनकी ही सीट घाटलोडिया से विधायक हैं। हालांकि, रूपाणी कहते रहे हैं कि पार्टी के भीतर जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं और राज्य की विकास यात्रा नये ऊर्जावान नेतृत्व में चलनी चाहिए, लेकिन उनके हटाये जाने के गहरे निहितार्थ हैं। पार्टी नेतृत्व को लगा कि भले ही रूपाणी राज्य में सरकार ठीक-ठाक चला रहे हों, लेकिन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की नैया शायद ही पार लगा पायें। पिछले दिनों सूरत स्थानीय निकाय चुनावों में आप की अप्रत्याशित कामयाबी ने पार्टी को चिंतित किया था। दूसरे रूपाणी जैन समाज से आते थे जो राज्य में सिर्फ दो फीसदी जनाधार रखता था। वहीं राज्य की राजनीति में वर्चस्व रखने वाला नाराज पाटीदार समुदाय पार्टी में बड़ी भूमिका चाह रहा था। दरअसल, हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल में पुराने चेहरे बदलकर नये चेहरों को दायित्व देने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसे ही राज्यों में दोहराया जा रहा है। पार्टी उसी नेता पर दांव लगा रही है जो आगामी चुनावों में पार्टी को जितवाने का दमखम रखता हो। यानी पार्टी जनता के मूड को भी भांप रही है।

अभी डेढ़ माह पूर्व कर्नाटक के दिग्गज नेता बीएस येदियुरप्पा को भी पार्टी ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था। वैसे ही उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत को कुर्सी पर ठीक से बैठने से पहले ही हटा कर युवा पुष्कर सिंह धामी को राज्य की बागडोर सौंप दी गई। तीरथ सिंह रावत को मार्च में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर कुर्सी सौंपी गई थी। असम में भी सर्बानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्वा सरमा को सीएम बनाया गया। वहीं उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ को हटाने की अटकलें थीं, लेकिन पार्टी ने बाद में महसूस किया कि वे चुनाव जितवाने वाले नेता हैं। फिर पार्टी ने उन्हें मजबूत किया। दरअसल, बदलाव का एक तर्क यह भी है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मजबूत स्थिति में है। हटाये जाने वाले नेता विरोध की स्थिति में नहीं हैं। दरअसल पार्टी कॉडर आधारित है, नेता को पद से हटाते ही कॉडर उससे अलग हो जाता है। फिर भाजपा के नेताओं को पता है कि नरेंद्र मोदी आज भी वोट जुटाऊ नेता हैं, ऐसे में विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसे में हटाये जाने वाले नेता भी केंद्रीय नेतृत्व के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। कहीं न कहीं पार्टी की यह सोच भी है कि पार्टी के खिलाफ जनता के रुझान को वह नेतृत्व परिवर्तन से खत्म कर सकती है। फिर गुजरात तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह का गृह राज्य है, ऐसे में पार्टी वहां आसन्न चुनाव में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती।

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