जान और जहान

सख्ती के बिना जिम्मेदारी समझें लोग

जान और जहान

ऐसे वक्त में जब कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर में संक्रमितों का आंकड़ा ढाई लाख पार कर गया है, प्रधानमंत्री का विभिन्न मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी से लड़ाई के लिये बैठक करना तार्किक नजर आता है। एक सप्ताह में यह प्रधानमंत्री की दूसरी बैठक थी, जिसमें कहा गया कि संक्रमण से बचाव हेतु प्रतिबंधों व उपायों को लागू करते वक्त ध्यान रहे कि स्थानीय स्तर पर लोगों की जीविका पर प्रतिकूल असर न पड़े। स्मरण रहे कि पहली लहर के दौरान लगे सख्त लॉकडाउन से नयी तरह का मानवीय संकट पैदा हुआ था। देश ने विभाजन के बाद पलायन की सबसे बड़ी त्रासदी को देखा। अब तक भी आर्थिक दृष्टि से स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पायी है। तीसरी लहर के दौरान राज्य सरकारों को स्थानीय प्रशासन को निर्देश देने होंगे कि संक्रमण की कड़ी तोड़ने के लिये एहतियाती उपाय जरूरी हैं, लेकिन जान के साथ जहान की रक्षा भी जरूरी है। देर-सवेर संक्रमण का दायरा सिमटेगा, लेकिन अर्थव्यवस्था को लगी चोट से उबरने में लंबा वक्त लग सकता है। मगर नये संक्रमण को लेकर जैसी दुविधा शासन-प्रशासन के सामने है, वैसी ही दुविधा देश की श्रमशील आबादी के सामने है। हालांकि, केंद्र व राज्य सरकारें आश्वासन दे रही हैं कि पूरा व सख्त लॉकडाउन नहीं लगाया जायेगा, लेकिन दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। पहली लहर की सख्त बंदिशों से महानगरों में श्रमिकों की त्रासदी की कसक अभी मिटी नहीं है। यही वजह है कि देश के कई राज्यों से श्रमिकों के पलायन की खबरें मीडिया में तैरती रही हैं। जाहिर है असुरक्षा बोध को दूर करने का आश्वासन उन उद्योगों की तरफ से श्रमिकों को नहीं मिल पाया, जहां वे काम करते हैं। ऐसे संकट के दौर में उद्योग व श्रमिकों के रिश्ते महज आर्थिक आधार पर न देखे जायें और उन्हें मानवीय संकट के संदर्भ में देखकर ऐसे आश्वासन दिये जाएं कि वे ऊहापोह की स्थिति से निकल सकें।

निस्संदेह, कोरोना की तीसरी लहर ने देश के सामने नये सिरे से बड़ी चुनौती पैदा की है, अच्छी बात यह है कि तेज संक्रमण के बावजूद अस्पताल में भर्ती होने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। निस्संदेह, इसके मूल में देश में चला सफल टीकाकरण अभियान भी है। आंकड़े बता रहे हैं कि मरने व अस्पताल में भर्ती होने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई थी। अब वे लोग भी टीका लगवा रहे हैं, जिन्होंने पहले इसकी अनदेखी की। सुखद है कि देश की पंद्रह से 18 साल तक की किशोर आबादी का टीकाकरण शुरू हो गया है और किशोरों ने उत्साह के साथ टीकाकरण अभियान में भागीदारी की है। इसके बावजूद जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि टेस्टिंग, ट्रैकिंग और ट्रीटमेंट की व्यवस्था जितनी बेहतर होगी, लोगों को अस्पताल में भर्ती करवाने की जरूरत उतनी ही कम पड़ेगी। उन्होंने अधिक संक्रमण वाले इलाकों में निषेध क्षेत्र घोषित करने तथा घरों में पृथकवास पर जोर दिया। दरअसल, जब से विशेषज्ञों ने कहा कि नया वेरिएंट कम घातक है, तो लोग इस संकट को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। भीड़भाड़ वाले इलाकों में कोरोना प्रोटोकॉल का पालन न करने की खबरें हैं। पूरी दुनिया कह रही है कि मास्क, सुरक्षित दूरी और बार-बार हाथ धोने से बचाव संभव है। विडंबना ही है कि जब तक प्रशासन सख्ती नहीं करता, हम नियम-कानूनों का पालन स्वेच्छा से नहीं करते। जबकि हमने पहली व दूसरी लहर में बड़ी कीमत चुकायी है। एक संकट यह भी है कि देश में बड़ी आबादी ऐसी है जो खांसी-जुकाम को सामान्य फ्लू मानकर जांच करने से बचती है। फिर गांव-देहात में कोरोना जांच की पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न होने की बात कही जाती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि अमेरिका में रोज दस लाख मामले आ रहे हैं तो उनकी जांच प्रक्रिया में तेजी और पर्याप्त चिकित्सा तंत्र का होना है। जांच की स्थिति ठीक होने पर भारत में वास्तविक संक्रमण की दर काफी अधिक हो सकती है।

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