बहिष्कार नहीं, बात करें

ताकि बेहतर हो जम्मू-कश्मीर का भविष्य

बहिष्कार नहीं, बात करें

जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने एवं उसे केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने के करीब दो साल बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अब वहां राजनीतिक अनिश्चितता खत्म करने की पहल की है। इसी दिशा में बढ़ते हुए केंद्र ने 24 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। बैठक में जम्मू एवं कश्मीर क्षेत्र के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया गया है। बताया जा रहा है कि इस बैठक का मुख्य एजेंडा परिसीमन है। असल में राज्य को दो हिस्सों में बांटने के बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने के लिए विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन जरूरी हो गया था। चुनावी दृष्टिकोण से परिसीमन एक अहम प्रक्रिया है। गौरतलब है कि 6 मार्च, 2020 को गठित परिसीमन आयोग को इस साल मार्च में एक साल का विस्तार दिया गया था। जनसंख्या बदलाव के साथ सभी को समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया जाता है। इस प्रक्रिया के जरिये विधानसभा सीटों की संख्या में भी बदलाव हो सकता है। परिसीमन की इस प्रक्रिया में क्षेत्र विशेष के राजनेताओं का प्रतिनिधित्व जरूरी होता है। परिसीमन के लिहाज से तो यह बैठक अहम है ही, इसके साथ ही इस सरहदी प्रदेश में आम जनता की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करना और जम्मू-कश्मीर के बेहतर भविष्य के लिए नीति बनाना भी सत्ता एवं सियासत का मुख्य कर्तव्य है। सर्वदलीय बैठक के लिए केंद्र से मिले न्योते पर भले ही अभी तक एक राय नहीं बन पाई हो, लेकिन किसी ने भी बैठक के बहिष्कार का ऐलान नहीं किया है, जो कि एक अच्छी पहल है। सभी सियासी दल बैठक में शामिल होने के लिए अपने नेताओं से लगातार बातचीत कर रहे हैं। पीडीपी ने जहां अपनी नेता महबूबा मुफ्ती पर फैसला छोड़ दिया है, वहीं नेशनल कानफ्रेंस मंगलवार यानी 22 जून को इस विषय में कोई फैसला लेगी।

इस बीच, इस मसले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ट्वीट किया, ‘कांग्रेस पार्टी का रुख जो कल था, उसे पुनः दोहराया जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए।’ यहां उल्लेखनीय है कि पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग अन्य विपक्षी दल भी कर रहे हैं, साथ ही केंद्र सरकार भी स्पष्ट कर चुकी है कि परिस्थितियां सामान्य होते ही जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। यानी पूर्ण राज्य बनाये जाने पर किसी भी दल को आपत्ति है ही नहीं, इसलिए इस मुद्दे को उछालना गैर वाजिब ही होगा। दरअसल अनुच्छेद-370 हटने और केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में सियासी हलचल पर सबकी नजर है। लंबी नजरबंदी के बाद तमाम नेताओं की रिहाई एवं जिला विकास परिषद के चुनावों के सफल संचालन के बाद जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। इसी बदलाव के बीच आगे की रणनीति के लिए केंद्र ने बैठक बुलाई है। बेशक गुपकार संगठन अभी तक केंद्र के न्योते पर आम राय नहीं बना पाया है और अनेक दल पूर्ण राज्य के दर्जे की ही अपनी मांग दोहरा रहे हैं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि बातचीत की टेबल पर सभी लोग मिलें। बैठक के बहिष्कार के बजाय किसी भी मुद्दे का हल वार्तालाप से ही निकलेगा। बातचीत के दौरान ही अपनी शिकायतों को भी दर्ज कराया जा सकेगा और इसके बाद भविष्य की रणनीति बनाने में भी सियासी दलों को आसानी होगी। अड़ियल रुख किसी ओर से भी अच्छा नहीं होता क्योंकि अड़ने से बाधाएं ही उत्पन्न होती हैं और वार्तालाप से ही किसी मुद्दे के हल निकलने की उम्मीद बढ़ती है। इसलिए सभी सियासी दलों के नेताओं को केंद्र का आमंत्रण स्वीकार करना चाहिए और जम्मू-कश्मीर के लोगों के बेहतर भविष्य के लिए सर्वसम्मति से फैसला लेना चाहिए।

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