छातों के नीचे गढ़े गए किस्से

छातों के नीचे गढ़े गए किस्से

हेमंत पाल

बारिश के मौसम में छाता जिंदगी का एक हिस्सा है। अमीर हो या गरीब, ये साधन सबके लिए एक ही काम करता है। ये बारिश के अलावा सूरज के ताप से बचाने के साथ जीवन की समृद्धि दर्शाने का भी प्रतीक है। जो जितना अमीर, उसकी छतरी उतनी महंगी। एक जमाना था, जब हाथ में छतरी होना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। तब छतरी सम्पन्न लोगों के हाथों में ही नजर आती थी। लेकिन, जब छाता सामाजिक वजूद रखने लगा, तो फिल्मों ने भी इसकी शान को स्वीकारा! छातों ने फिल्मों में कथानक के मुताबिक अपनी जगह बनाई।

राज कपूर ने अपनी कई फिल्मों में छतरी से प्रभाव पैदा करके कहानी को आगे बढ़ाया! कई फिल्मों में छतरी को नायक ने हथियार की तरह इस्तेमाल कर गुंडों की धज्जियां भी बिखेरी हैं। पुरानी फिल्मों के खलनायक केएन सिंह की खलनायकी का एक अलग अंदाज था। अभिजात्य वर्ग का ये खलनायक हमेशा सूट-बूट और हैट पहने दिखाया गया। मुंह में पाइप दबाए केएन सिंह जब परदे पर आते तो दर्शकों में सिहरन सी होती थी। उनके इस अभिजात्य अंदाज़ में कई फिल्मों में हाथ में छतरी भी दिखाकर प्रभाव पैदा किया जाता था। आशय यह कि छतरी सिर्फ बारिश से बचने का साधन ही नहीं, इसके जरिए फिल्मों में कई अनूठे प्रसंग भी गढ़े गए।

इसके बावजूद फिल्मों में छाते को कहानी से जोड़कर कथानक को आगे बढ़ाने के प्रयास कम ही हुए। लेकिन, गीतों में बतौर प्रॉप छातों का प्रयोग लम्बे समय से होता रहा है और आज भी ये दिखाई देता है। कथानक में छातों के इस्तेमाल का जिक्र किया जाए, तो ऐसी दो फिल्में ही ध्यान में आती है जिनमें छातों का बेहतरीन उपयोग किया गया। पहली फिल्म है, मनोज कुमार निर्देशित 'पूरब और पश्चिम' जिसकी शुरुआत की रीलें ब्लैक एंड व्हाइट थी। इसमें देश के गद्दार देशप्रेमी कृष्ण धवन की जानकारी ब्रिटिश सिपाहियों दे देते हैं, जो उसे बरसते पानी में गोलियों से छलनी कर देते हैं। प्राण छाते की आड़ से यह सब होते देख लेता है। इस दृश्य को फिल्माने में मनोज कुमार ने छाते का बेहद प्रभावी उपयोग किया था।

इसके बाद सनी देओल की फिल्म 'अर्जुन' में मुंबई के एक उपनगरीय रेलवे स्टेशन के बाहर बरसात का दृश्य था, जिसमें लोग छाता लिए आते-जाते हैं। इन्हीं छातों की आड़ में एक हत्या हो जाती है। इस सीन की शूटिंग के लिए कई लोग बुलाए गए थे। यह दृश्य बारिश में शूट होना था और तलवारें भी चलनी थीं। हर आदमी के हाथ में दो-दो छाते थे। कभी तलवारों से छाते फट जाते, कभी चेहरों पर छातों की तीलियां चुभ जाती। बहुत मुश्किल ये सीन पूरा हुआ! लेकिन, जब दर्शकों ने परदे पर इसे देखा तो ये हिंदी सिनेमा के कालजयी दृश्यों में एक बन गया। दृश्य में सैकड़ों छाते दिखा निर्देशक राहुल रवैल और सिनेमेटोग्राफर बाबा आजमी ने उसे यादगार बना दिया था।

1953 में आई फिल्म 'श्री 420' के गीत 'प्यार हुआ इकरार हुआ' के जहन में आते ही राज कपूर और नरगिस की जोड़ी स्मृतियों में कौंध जाती है। शाम ढलने के साथ गढ़े गए उस दृश्य को हिंदी फिल्मों का क्लासिक गीत ही नहीं, छतरी की आड़ में श्रेष्ठ रोमांटिक दृश्य भी माना जाता है। बरसात की फुहारों के बीच इस युगल गीत में प्रेम का उदात्त भाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसमें पानी की बौछार, चाय वाले की केतली से उड़ती गर्म भाप और नरगिस की भाव भंगिमाओं ने इसे रोमांस की चरम सीमा तक पहुंचा दिया था। कहा जा सकता है कि छतरी वाले गीतों और दृश्यों में राज कपूर को महारत हासिल थी। उनकी फिल्म 'छलिया' में मनमोहन देसाई ने 'डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा' फिल्मा कर बारिश में कल्याणजी-आनंदजी के संगीत का मजा दोगुना कर दिया था। इस गीत के साथ एक रोचक प्रसंग भी जुड़ा है। संगीतकार शंकर-जयकिशन को आपत्ति थी, कि गीत के बोलों में 'रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियां' सही लाइन नहीं है। क्योंकि, दिशाएं तो चार होती थी। राज कपूर ने भी उनकी बात पर सहमति जताई! लेकिन, कहा कि जब शैलेंद्र ने लिखा है, तो कुछ कारण होगा। जब शैलेंद्र से पूछा गया तो उन्होंने दस दिशाएं -ऊर्ध्व-अधो, ईशान-नैऋत्य, आग्नेय-वायव्य, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण- गिनवा दीं।

राज कपूर की फिल्मों में छाते

राज कपूर ने 'श्री 420' में छतरी को रोमांटिक दृश्य में उपयोग किया, तो फिल्म 'बूट पॉलिश' में उन्होंने समाज के दो वर्गों में भेद दिखाने के लिए छाते का प्रसंग बनाया था। फिल्म के दृश्य में राशन की लम्बी कतार में समाज के गरीब और समृद्ध वर्ग के लोग खड़े हैं। अचानक बारिश होने लगती है और भगदड़ हो जाती है. साथ ही दोनों वर्गों का भेद भी स्पष्ट हो जाता है। छाते वाला समृद्ध वर्ग छाता खोलकर फिर कतार में लग जाता है, जबकि समाज का वंचित वर्ग कतार छोड़कर अपने आपको भीगने से बचाने के लिए कहीं दुबक जाता है। रजनीकांत की फिल्म 'काला' के एक दृश्य में नायक एक छतरी के सहारे अपने दुश्मनों से लड़ता है और सबको मार गिराता है। वैसे रजनीकांत की फिल्मों में कुछ भी यथार्थ नहीं होता, फिल्म के दृश्य में जिस तरह छतरी को हथियार बताया गया, वो देखने में ही अच्छा लगता है।

राज कपूर से पहले गुरुदत्त अपनी निर्देशित फिल्म 'बाजी' में गीता दत्त पर 'देख के अकेली मोहे' गीत फिल्मा चुके थे। इसमें गीता बाली क्लब डांसर थी, जो रेनकोट पहनकर हाथों में छाता लेकर गाती है। यह गीत बरसात में नहीं, बल्कि क्लब में होता है, जहां गीता बाली छींटे उड़ाकर आभासी बरसात का अहसास कराती है। 'बाजी' के बाद गुरुदत्त ने 'मिस्टर एंड मिसेज-55' में 'ठंडी हवा काली घटा' गीत में मधुबाला और उनकी सहेलियों के हाथों में छतरी पकड़ाई थी। लेकिन, यहां बारिश की जगह स्विमिंग पूल नजर आ रहा था। अशोक कुमार और नलिनी जयवंत की फिल्म 'समाधि' के गीत 'गोरे गोरे ओ बांके छोरे' में भी छाते का प्रयोग किया गया था।

जब फिल्मी छातों में छुपकर रोमांस का जिक्र हो, तो देव आनंद की चर्चा होना लाजमी है। उनकी फिल्म 'काला बाजार' का हिट गीत 'रिमझिम के तराने लेके आई बरसात' में देव आनंद बारिश से बचने के लिए अखबार सिर पर रख लेते हैं! जबकि वहीदा रहमान छाते में होती है, बाद में दोनों छाते के नीचे थोड़ा भीगते हुए दिखाई देते हैं। देव आनंद एक बार फिर 1969 में फिल्म 'महल' में आशा पारेख के साथ रंग बिरंगे छातों में 'ये दुनिया वाले पूछेंगे' गाते दिखाई दिए थे। इसके अलावा फिल्म 'एक साल' में जॉनी वाकर और मीनू मुमताज 'दिल तो किसी को दोगे' गाते हुए धूप में छाता थामे दिखाई दिए, तो 'दो झूठ' में विनोद मेहरा बारिश में रोमांस का मजा लेने के लिए मौसमी चटर्जी से कहते हैं 'छतरी न खोल उड़ जाएगी।' इसके बाद 'मान गए उस्ताद' में शशि कपूर और हेमा मालिनी छतरी थामे शिकायत करते हैं 'एक छतरी और हम हैं दो।' जबकि, 'चालबाज' में श्रीदेवी रेनकोट पहने छाताधारियों के लिए अबूझ पहेली बनकर सुनती रहती हैं- 'ना जाने कहां से आई है!' आमिर खान की कालजयी फिल्म 'थ्री इडियट्स' के गीत 'जुबी जुबी' में भी छाता दिखाई दिया था।

अभी गया नहीं छातों का जमाना

1982 की फिल्म 'नमक हलाल' में अमिताभ बच्चन और स्मिता पाटिल पर फिल्माया 'आज रपट जाएं तो' गीत में भी बारिश में स्मिता का छाता उड़ जाता है। बप्पी लहरी के संगीत से सजा यह गीत अपने समय में बहुत लोकप्रिय हुआ था। 'कोई मिल गया' में प्रीति जिंटा और रितिक रोशन छतरी लेकर 'इधर चला मैं उधर चला' गीत पर बारिश में झूमते दिखाई देते हैं। 'नाजायज' में 'अभी जिंदा हूं तो जी लेने दो भरी बरसात में पी लेने दो' और 'दरियादिल' में 'बरसे रे सावन कांपे मेरा मन' जैसे कई गीत बरसात और छाते की याद दिलाते हैं। 2006 में विशाल भारद्वाज ने बच्चों के लिए रस्किन बांड की कहानी 'द ब्लू अम्ब्रेला' पर आधारित फिल्म 'द ब्लू अम्ब्रेला' बनाई थी। अजय देवगन की फिल्म 'मैदान' के पोस्टर में अजय देवगन फॉर्मल लुक में हाथ में छतरी और बैग लेकर फुटबॉल को किक मारते नजर आ रहे हैं। यानी अभी फिल्मों से छतरी का जमाना गया नहीं है।

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