तिरछी नज़र

बिना नक्शे-कैलेंडर के भागता वक्त

बिना नक्शे-कैलेंडर के भागता वक्त

शमीम शर्मा

शमीम शर्मा

आज मेरे ज़हन में उस नौजवान की छवि उभर रही है जो सड़क किनारे नक्शे और कैलेंडरों के बंडल लिये बैठा रहा करता। आते-जाते लोग उससे अपना मनपसंद कैलेंडर खरीदते। इन कैलेंडरों में गांधी-नेहरू से लेकर विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस, चन्द्रशेखर, भगतसिंह, लक्ष्मीबाई और फिल्मी हस्तियां माधुरी दीक्षित, सलमान खान तक के चित्र मिलते थे। कुछ कैलेंडरों में सुंदर सीनरी हुआ करतीं तो कुछ में फूल और पहाड़ हुआ करते। कुछ कैलेंडरों में लक्ष्मी-गणेश के चित्र होते तो कइयों में प्यारे-प्यारे बच्चों की तस्वीरें हुआ करतीं। पर अब वह कैलेंडर बेचने वाला दिखाई नहीं देता। पता नहीं वह किस धन्धे में जुट गया पर दीवारें उन कैलेंडरों को याद खूब करती हाेंगी।

नये साल पर देसी तिथियों वाले कैलेंडर की हमेशा मांग रहा करती। पर ज्यादातर अंग्रेजी कैलेंडर ही बिका करते। हर साल कई लोग तो 31 दिसंबर को यह बताने में जुट जाते हैं कि यह अपना नववर्ष नहीं है। साल भर जिस कैलेंडर का उपयोग करते हैं, उसी का बहिष्कार करने की अपीलें करते हैं। जो लोग वर्ष भर ग्रेगोरियन कैलेंडर को देखकर जन्मदिन और एनिवर्सरी मनाते हैं, उसी का तिरस्कार करते हैं। सत्य तो यह है कि आज की युवा पीढ़ी को पता तक नहीं है कि कौन-सा विक्रमी संवत चल रहा है।

कैलेंडरों की तो ऐसी की तैसी हुई सो हुई पर विज्ञान के विकास के साथ-साथ समय नक्शों को भी खा गया। जीपीएस आने के बाद नक्शे देखने का मौका ही नहीं मिला। बचपन के खेलों में यह भी शामिल था कि नक्शे में बड़े-बड़े शहरों को ढूंढ़ा करते। पर अब नक्शे पुराने ज़माने की चीज़ हो गये हैं। न स्कूल की दीवारों पर टंगे मिलते हैं और न ही घरों में।

चारों ओर गूगल मैप की तूती बोल रही है। इतनी तरक्की होने के बावजूद गूगल मैप अभी भी बताने में असमर्थ है कि प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया। पति-पत्नी की लम्बी लड़ाई के बाद एक बात अवश्य कही जाती है कि भाड़ में जाओ। यह भाड़ कहां है किसी नक्शे में नहीं मिला। एक सत्य यह भी है कि जितने अपडेट भारत के नक्शे में हुए हैं, शायद किसी और देश के नक्शे में नहीं हुए होंगे। एक देशप्रेमी की चेतावनी है कि गूगल मैप इस्तेमाल न करें, स्वदेशी बनें और नुक्कड़ पर स्थित पानवाले या चायवाले से ही रास्ता पूछें।

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एक बर की बात है अक नत्थू दिल्ली मैं नक्शे बेचण खात्तर सड़क किनारे बैठ्या था। सांझ हो ली पर कोय खरीददार नीं आया। भूख के मारे वो कती बेहाल होकै बेहोश होग्या तो बेसुधी मै बोल्लण लाग्या— हे राम! मैं कित पड़्या हूं? धोरै खड़्या सुरजा बोल्या— रै बावलीबूच! बूज्झै के है, तेरै धोरै नक्शे रहे, देख ले कित पड़्या है?

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