पक्षियों के प्रति भी संवेदनशील बने हम

पक्षियों के प्रति भी संवेदनशील बने हम

क्षमा शर्मा

क्षमा शर्मा

हर साल इन दिनों बर्ड फ्लू की आवाजें सुनाई देती हैं। बढ़े हुए खतरे की बातें की जाने लगती हैं। इस बार महसूस हुआ कि अभी कोरोना से निजात मिली नहीं कि यह एक आफत और आ पहुंची। चिड़िया मरने लगती हैं, आशंका व्यक्त की जाने लगती है कि बर्ड फ्लू आ पहुंचा है। कैसे आया है। शायद प्रवासी पक्षियों से आया है। और इस तरह तमाम पक्षियों, उनके बच्चों आदि को जान से हाथ धोना पड़ता है।

मनुष्य को बचाने के लिए कभी दवा बनाने और वैज्ञानिक परीक्षण, तो कभी बीमारी न फैल जाए, इस संदेह के कारण हर बार ही बेचारे पक्षियों, जानवरों को जान देनी पड़ती है। अगर ये बता सकते, लिख सकते तो पता चलता कि मनुष्य की सभ्यता का इतिहास इनके ऊपर अत्याचारों से होकर ही गुजरा है।

जिसे हम बर्ड फ्लू के कारण चिड़ियों का मर जाना कह रहे हैं, ऐसा भी तो हो सकता है कि इस तेज ठंड और पाले को वे न सह पाए हों और जान गंवा दी हो। उन्हें भी सर्दी, गर्मी लगती है। वे भी बदलते मौसम का शिकार होते हैं। उन्हें भी बहुत से वे रोग लगते हैं जो मनुष्यों को होते हैं। बर्ड फ्लू का नाम तो अब चल पड़ा है मगर ठंड और गर्मी में बहुत सी चिड़ियों को मरते देखा है। पक्षियों के अस्पताल में भी बहुत से बीमार पक्षी पहुंचते ही हैं।

इस संदर्भ में बचपन की एक घटना भुलाए नहीं भूलती। बहुत छोटी थी। पढ़ना शुरू ही किया था। हाथ में पट्टी लेकर स्कूल जा रही थी। बहुत ठंड थी। पिताजी रेलवे में थे। इसलिए रेलवे स्टेशन पर ही घर था। हर रोज रेलवे लाइन पार करके स्कूल जाना पड़ता था। ठंड से दांत किटकिटाते, जब पटरी के पास पहुंची तो घबरा गई। पटरी के दोनों ओर, किनारे-किनारे और बीचोबीच दूर तक असंख्य गौरैया मरी पड़ी थीं। छोटी थी तो समझ न सकी कि क्या हुआ। लेकिन चिड़ियों के इस तरह से मर जाने से रोना आने लगा। और रोने की वजह बना घर का पालतू मिट्ठू। चिड़ियों को इस तरह मरा हुआ देखकर लगा कि कहीं अपना मिट्ठू भी तो नहीं मर जाएगा।

घर लौटकर जब पिताजी से पूछा तो वह बोले कि भाई तेज पाला पड़ रहा है। इतनी ठंड है । हम लोग इतने स्वेटर पहने हैं, रात में दो-दो कम्बल या मोटी रजाइयों में सोते हैं, तब भी ठंड लगती है। उन बेचारियों के पास न ऐसी कोई अंगीठी रखी है कि आग ताप लें या स्वेटर पहन लें, रजाई, कम्बल ओढ़ लें। इन बेचारे पक्षियों की तकलीफ के क्या कहने। तब इस तरह से चिड़ियों का न रहना किसी बर्ड फ्लू का संकेत नहीं बल्कि ठंड की मुसीबत माना जाता था।

इसी संदर्भ में दूसरी एक घटना याद आती है। सन‍् 2009 में बर्ड फ्लू के खतरे के बारे में पहली बार अपने देश में सुना था। चैनल्स पर रात-दिन का हाहाकार मचा हुआ था। बताया जा रहा था कि बर्ल्ड फ्लू दुनिया भर में तेजी से फैल रहा है और इससे दुनिया के लोगों पर भारी खतरा छाया हुआ है। यह अगस्त, 2009 की बात है। उन्हीं दिनों मुझे और मेरे पति को यूरोप जाना था। एक बार तो सोचा कि न जाएं । पता नहीं जहां जाना है, वहां यह बीमारी कितनी फैली हो और हम भी चपेट में आ जाएं। फिर सोचा कि ऐन मौके पर टिकट कैंसल कराएंगे तो काफी नुकसान होगा। चले ही जाते हैं। जो होगा, सो देखा जाएगा।

खैर, जब हम दिल्ली के टी थ्री हवाई अड्डे पर पहुंचे तो वहां ड्यूटी पर तैनात विभिन्न कर्मचारियों को देखकर घबराहट होने लगी। सब लोग मास्क पहने थे। यानी कि उन्हें बर्ड फ्लू से संक्रमण का खतरा था। जबकि यात्रियों में बहुत कम लोग मास्क लगाए थे। खैर यहां से चलकर जब तुर्की के इस्ताम्बूल हवाई अड्डे पर उतरे तो यह देखकर दंग रह गए कि वहां किसी ने मास्क नहीं लगा रखा था। आखिर क्यों। खबरें तो यही थीं कि पूरी दुनिया में यह बीमारी फैल रही है। या कि ऐसी खबरें सिर्फ भारत जैसे गरीब देशों में डर फैलाने के लिए ही होती हैं। बाद में यह भी पता चला था कि इसमें इस बीमारी की दवा बनाने वाली कम्पनियों का भी हाथ था।

इस दौर में फ्रांस की उन कम्पनियों ने काफी लाभ कमाया था जो इस बीमारी की दवा बनाती थीं। ब्रिटेन की कम्पनियों को लाभ से वंचित होना पड़ा था, इसलिए उन्होंने इनकी पोल खोल दी थी। बाद में यह भी पता चला था कि ऐसी ही एक कम्पनी में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के प्रशासन के बड़े अधिकारी रम्सफील्ड के भारी शेयर थे। वहां से ही भारत सरकार ने बर्ड फ्लू से लड़ने के लिए दस लाख कैप्सूल खरीदे थे, जो बाद में किसी काम भी नहीं आए थे।

इस बीमारी के बारे में यह भी कहा जाता है कि इससे इनसान को कोई खास खतरा नहीं होता, फिर भी बेचारी चिड़ियां अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं। इनसानों को बचाने के लिए उन्हें मार दिया जाता है। क्या ऐसा कोई इलाज हो सकता है कि इस बीमारी से इन चिड़ियों को बचाया जा सके। जिससे कि मनुष्यों को इऩसे डर न लगे। हालांकि पक्षियों की दुनिया में उस तरह से नहीं प्रवेश किया जा सकता, जैसे इनसानी दुनिया में किया जा सकता है। न ही उन्हें किसी बीमारी के खतरे के बारे में समझाया जा सकता है। न ही उनका टीकाकरण किया जा सकता है। तो क्या पक्षियों को बचाने का वाकई कोई तरीका नहीं।

ये बात दीगर है कि हमारी लापरवाही से गौरैया खत्म हो रही है। उसे बचाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनानी पड़ रही हैं। इसी तरह हमें अपने दूसरे पक्षियों की रक्षा करने की जरूरत है। यह चीन नहीं है जहां पक्षियों को लोग बर्दाश्त नहीं कर सकते। माओ ने फसलें बचाने के लिए पक्षियों को मारने का आह्वान किया था। तब से अब तक वहां पक्षियों को मारने की होड़ लगी रहती है। हमें अपने पशु–पक्षी भी उतने ही प्यारे हैं, जितने इनसान। उनकी जान भी उतनी ही कीमती है, जितनी हमारी।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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