अतीत से सबक ले चुनौती का मुकाबला

अतीत से सबक ले चुनौती का मुकाबला

सुरेश सेठ

सुरेश सेठ

हमारा देश उत्सवधर्मी देश है। अभी दिवाली से लेकर नववर्ष के आगमन तक उत्सव मनाने के दिन थे। कोरोना के ओमीक्राेन वेरिएंट के बढ़ते खतरे के बावजूद, सेहत संगठनोंं, प्रशासन एवं प्रधानमंत्री की चिंताभरी चेतावनियों के बावजूद, सभी के आदेश केवल भाषणों, मीडिया एवं विज्ञापन प्रसारणों का शृंगार रहे। दिसंबर के आखिरी दिनों में बर्फबारी देखने का आनंद लेने के लिए पर्यटकों की भारी भीड़ ने शिमला से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ी स्थलों का रुख किया। सभी होटल और रुकने के स्थल भर गये। शिमला में तो गाड़ियों की पार्किंग की जगह नहीं रही। अत: कायदे तोड़ कर जहां जगह मिले, वहीं गाड़ी पार्क कर लो, का अलिखित नियम लागू हो गया।

किसान इस बीच दिल्ली मोर्चा विजय कर लौटे अपनी नयी प्राप्त राजनीतिक शक्ति को त्यागने के लिए तैयार नहीं थे। टोल प्लाजा की दरें बढ़ने से लेकर कर्ज माफी और एमएसपी देने की अनिवार्यता तक के मुद्दे पर उनके धरने पंजाब में लग गये। रेल ट्रैक भी निशाना बने। पंजाब से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी मुल्तवी हो गयी। परिवहन व्यवस्था चरमरा गयी। रेलें बन्द तो बसों पर यात्रियों का रिकार्ड बोझ बढ़ गया। वैष्णो देवी में अटक गयी भारी भीड़ को इनके द्वारा निकालना एक समस्या बन गयी।

‘हम नहीं सुधरेंगे’ के अंदाज में अब जबकि नये वर्ष का उत्सव भी इस भीड़ भरे अंदाज में मना लिया गया है। कोरोना महामारी की तीसरी लहर के आगमन की चिंता भरी खबरें आने लगी हैं। कई महीनों तक देश में टीकाकरण के रिकार्ड तोड़ अभियान के कारण विशेषज्ञ यह कह रहे थे कि भारत में कोरोना की तीसरी लहर का आना स्थगित हो गया है। लेकिन अब कई महीनों के बाद कोरोना के केस बढ़ने लगे और वह भी ओमीक्रोन वेरिएंट के।

एक केस कर्नाटक से शुरू हुआ था। एक पखवाड़े में ही इसने देश के सत्रह राज्यों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। एक से बढ़कर केस साढ़े तीन सौ के पार चले गये। यह वृद्धि लगातार जारी है। सरकार ‘हर घर टीकाकरण’ और ‘ट्रेसिंग, टैस्टिंग और टीकाकरण’ की त्रिमुखी नीति के साथ इससे निपटने की नीति में नया दम भरना चाहती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ महीनों में कोरोना का दबाव कम हो जाने से टीकाकरण की गति धीमी हो गयी थी। यहां तक कि टीकाें के भारतीय उत्पादन को जरूरत से अधिक मानकर अिधक जरूरतमंद देशों में निर्यात करने की घोषणा भी हो गयी थी, सिरिंज बनाने वाली फैक्टरियों ने भी उत्पादन कम कर दिया था, एेसी खबरें मिलीं। अब पुन: इस अभियान के लिए कमर कसनी होगी। घर-घर ट्रेसिंग, टैस्टिंग और टीकाकरण की घोषणा में नये प्राण डालने होंंगे।

लेकिन क्या टीकाकरण ही इस लौटती महामारी की अंतिम दवा है? चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं, ‘जी नहीं।’ ये टीके तो मात्र संंक्रमित हो सकने वाले व्यक्तियों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं, रोग के जड़ से उन्मूलक नहीं। इसके लिए इन टीकोंं को नये आविष्कार और शोध के साथ रोग को जड़ से उखाड़ देने वाला बनाना होगा।

कोरोना धूर्त है। पल-पल अपना रूप बदलता है। नये वायरस अपना तांडव दिखाते हैं। इसलिए न केवल ये टीके एेसे बनें कि इन वायरसों की जड़ से खबर लें। बल्कि यह भी कहा जा रहा है कि अगर अब अपनी दुनिया कोरोना को हमेशा के लिए विदा नहीं कर सकती। फ्लू की तरह हर बरस इसका आगमन होता ही रहेगा। तो फ्लू के उपचार की तरह टीकों में निरंतर शोध चले, सेहत लाभ देने वाले तत्व इनमें शामिल होते रहें। मात्र रोग का मुकाबला करने के लिए रोगी की क्षमता बढ़ाने वाले टीके से काम नहीं चलेगा। अब एक एेसा टीका बनाया जाये जो कोरोना में पनपने वाले हर वायरस की खबर ले और उसे बृहद स्तर पर पनपने न दे।

लेकिन अभी देश में अोमीक्राेन वेरिएंट वाले जिस कोरोना को त्वरित गति से चलने वाला रोग मान कर हम इसकी रोकथाम कर रहे हैं, इसके उपचार पुराने हैं। पहले तो यह माना जा रहा है कि रोगियों का इलाज पहले डेल्टा या डेल्टा प्लस वेरिएंट वाले में उपचार से हो जायेगा। वही पैरासिटामोल और ताकत बढ़ाने वाले विटामिन।

लेकिन रोग के इस नये रूप का मुकाबला करने के लिए नयी उपचार विधि अपनायी जाये। दूसरी लहर में की गयी गलतियां न दोहरायें। केवल घोषणा ही न हो कि इस बार आक्सीजन के सिलेंडरों और वेंटिलेटरों की कोई कमी न होने दी जायेगी, बल्कि यह देख लिया जाये कि क्या इनकी आपूर्ति हो गयी है? इनके इस्तेमाल के लिए निपुण परिचर्या करने वाले यथा स्थान पहुंच गये हैं। अभी तो हालत यह है कि चिकित्सा कर्मी जिन्हें कोरोना से जूझने वाले रणबांकुरों की प्रथम पांत कहा जाता है, वे अपनी अपूर्ण मांगों को लेकर पंजाब और अन्य जगहों पर हड़ताल पर हैं। ये हड़तालें निपटाइये, ताकि रोगियों की जान बचाने वाले संंतुष्ट होकर पूरी शक्ति से रोगियों की सेवा में जुटे और उनकी जानें बचायें।

चाहे यह कहा जा रहा है कि ओमीक्रोन कोरोना बहुत तेजी से फैलता है, लेकिन कम खतरनाक है और रोगी को अस्पताल ले जाने की कम जरूरत पड़ती है। लेकिन अभी यह अध्ययन सौ प्रतिशत सत्य सिद्ध नहीं हुआ। अभी से प्रशासन तंत्र को सावधान होने की जरूरत है। दवाओं की चोरबाजारी, आक्सीजन सिलेंडरों, वेंटिलेटरों की बनावटी कमी और निजी अस्पतालों की चांदी काटने की मारामारी इस बार न हो, जैसा कि पिछली बार हुआ था।

तकनीकी और आंकड़ा विशेषज्ञ अभी से बता रहे हैं कि यह नया वर्ष कोरोना की तीसरी लहर ला रहा है। फरवरी मास तक इसके शिखर तक पहुंचने की उम्मीद है। इसलिए इससे जूझने वाली रणनीति को लागू कर दिया जाये।

जब यह लहर बता रही है कि इस बार इस महामारी की गिरफ्त में बूढ़ों के साथ बच्चे और गर्भवती औरतें अधिक आयेंगी तो बच्चों का टीकाकरण तत्काल शुरू किया जाये, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में किया जा रहा है। जब अन्य देश कोरोना की तीसरी बूस्टर डोज लगाने की शुरुआत कर चुके हैं तो भारत में इसके फैसले में पीछे क्यों रहना? तत्काल बूस्टर डोज लगाने और बच्चों को टीका लगाकर सुरक्षित किया जाये, ताकि लगभग दो वर्षों के बाद जो जिंदगी सामान्य गति पकड़ रही है, उसमें हतोत्साह के अवरोध न खड़े हो जायें।

अभी से कई राज्यों में इस कोरोना से एहतियात के प्रतिबंध लगने लगे हैं, पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव टालने की बातें होने लगी हैं। यह भविष्यवाणी भी हो रही है कि इस नये साल में आम आदमी को महंगाई की दुश्वारियों और परेशानी से अधिक जूझना पड़ेगा।

ये आसार बताते हैं कि इस बार चिकित्सा बिरादरी अपनी कमर अधिक कसें। महामारी से उभरने वाले मौतों के सैलाब को उठने न दें। जिंदगी को अधिक से अधिक सामान्य रखने की कोशिश की जाये। पिछले दो साल की पूर्ण अपूर्ण बन्दिशों ने हमारी अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इसे पुन: जीवनदान देना है। इसमें कोताही न हो।

लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।

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