अस्पतालों में कोरोना संक्रमण की संवेदनशीलता

अस्पतालों में कोरोना संक्रमण की संवेदनशीलता

मुकुल व्यास

मुकुल व्यास

अस्पतालों और नर्सिंग होमों में कोरोना वायरस का संक्रमण रोकना एक बड़ी चुनौती है। इन जगहों पर वायरस के संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा होता है क्योंकि संक्रमित मरीज और स्वस्थ लोग एक ही कमरे में लंबे समय तक रहते हैं। वायरस हवा में मौजूद अदृश्य एरोसोल कणों के जरिए कई मीटर दूर तक फैल सकता है। इस साल के आरंभ में अस्पतालों और नर्सिंग होमों की भीतरी हवा में एरोसोल कणों के जरिए संक्रमण के मामलों की कई खबरें आई थीं।

नीदरलैंड में एक नर्सिंग होम में तो वेंटिलेशन सिस्टम के जरिए संक्रमण फैला क्योंकि वार्ड में मौजूद हवा साफ नहीं थी। बाद में वहां के एयर कंडीशनिंग सिस्टम के डस्ट फिल्टर में सार्स-कोव-2 वायरस की मौजूदगी का पता चला। अनेक विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप में इस शरद में संक्रमण के मामलों में अचानक जो वृद्धि हुई, उसके पीछे अस्पतालों के अंदर एरोसोल कणों के जरिए वायरस का फैलाव मुख्य कारण था। लोग ज्यादा समय तक घरों के अंदर रहते हैं। जैसे-जैसे तापमान घटता है, भीतरी स्थानों में वेंटिलेशन भी कमजोर पड़ने लगता है। घरों के अंदर संक्रमित लोगों के रहने पर हवा में वायरस के कणों की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। मास्क पहनने से हवा के जरिए वायरस का संक्रमण कम किया जा सकता है लेकिन इसे पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता।

रिसर्चरों ने एक अध्ययन में पता लगाया है कि अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों वाले आईसीयू कमरों में करीब एक-चौथाई कमरे वायरस की आनुवंशिक सामग्री से प्रदूषित थे। चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पतालों के बाथरूमों और टॉयलेट्स से लिए गए 20 प्रतिशत नमूने पॉजिटिव पाए गए। इसके अलावा अस्पतालों के गलियारों से लिए गए आधे से ज्यादा नमूने पॉजिटिव निकले। फ्रांस में यूनिवर्सिटी ऑफ नाट के सेंट्रल हॉस्पिटल की रिसर्च टीम का कहना है कि वायरस की अत्यधिक मात्रा में मौजूदगी और अपर्याप्त वेंटिलेशन वाले कमरों में लोगों की अधिक संख्या की वजह से डॉक्टर और हैल्थ वर्कर बड़ी संख्या में संक्रमित हुए, हालांकि उन्होंने पीपीई पहन रखे थे।

रिसर्चरों ने अपने विश्लेषण के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, इटली सहित आठ देशों में पिछले साल 1 जनवरी से 27 अक्तूबर तक किए गए 24 अध्ययनों को सम्मिलित किया। अस्पताल में दाखिल मरीजों के कमरों और आईसीयू से हवा के नमूने लिए गए। नर्सों के स्टेशनों, स्टाफ के कमरों तथा अस्पतालों के भीतर गलियारों जैसे सार्वजनिक स्थानों से भी नमूने लिए गए। एकत्र किए गए 893 नमूनों में 17.4 प्रतिशत वायरस के आरएनए या आनुवंशिक सामग्री की वजह से पॉजिटिव पाए गये। आईसीयू कमरों के अलावा प्रदूषित नमूनों का सबसे ज्यादा प्रतिशत रेस्ट रूम और गलियारों में पाया गया।

अस्पतालों और नर्सिंग होमों में कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए अनेक कदमों की आवश्यकता है। इसके लिए हवा के जरिए होने वाले संक्रमण से स्वास्थ्य कर्मियों को बचाने के लिए एक नयी रणनीति बनाना बहुत जरूरी हो गया है। नयी दिल्ली स्थित सीएसआईआर-नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी, जर्मनी में लाइपजिग स्थित लाइबनिट्ज इंस्टीटयूट फॉर ट्रोपोस्फीयर रिसर्च, रोम के इंस्टीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक साइंस एंड क्लाइमेट तथा अमेरिका में कोलोराडो स्थित 2बी टेक्नोलॉजिज ने अस्पतालों में हवा के जरिए फैलने वाले वायरस का विस्तार से अध्ययन किया है। इन संस्थानों के रिसर्चरों का कहना है कि अस्पताल जैसी जगहों में भीतरी हवा पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही स्टाफ को और ज्यादा प्रशिक्षित करने की भी आवश्यकता है। रिसर्च टीम ने अपने अध्ययन का उल्लेख इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ पत्रिका में किया है।

टीम ने जो कदम सुझाए हैं, उनमें नियमित वेंटिलेशन, कार्बन डाइऑक्साइड मॉनिटर के जरिए स्वच्छ हवा की खपत का नियंत्रण, ह्यूमिडिफायर (नमी बढ़ाने वाला उपकरण) का प्रयोग और कमरों का नियमित डिसइंफेक्शन शामिल है। अस्पतालों के भीतर सांस की नली के संक्रमण को रोकने के लिए नमी को 40 से 60 प्रतिशत के बीच रखने के लिए ह्यूमिडिफायर जरूरी है। नमी की इस रेंज में मनुष्य की नाक, सांस नली और फेफड़ों आदि की झिल्लियां (म्यूकस मेम्ब्रेन) संक्रमण का सर्वाधिक प्रतिरोध करती हैं।

यदि कमरों में समुचित वेंटिलेशन संभव नहीं हो तो पोर्टेबल एयर प्यूरिफायर का भी प्रयोग किया जा सकता है। एयर कंडीशनिंग सिस्टम या वेंटिलेशन के जरिए ताजी हवा का प्रवाह बहुत आवश्यक है। कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा नापने वाले उपकरणों के प्रयोग से शुद्ध हवा के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकता है। कमरों के भीतर कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा का मतलब यह है कि कमरे में सांस से छोड़ी गई हवा बहुत ज्यादा है। यदि कमरे में संक्रमित व्यक्ति मौजूद है तो हवा में वायरस के कण ज्यादा होंगे जो स्वस्थ व्यक्ति की सांस में जा सकते हैं। अस्पतालों में सर्जरी और आईसीयू में मरीजों को लगाई जानी वाली ट्यूबों, डेंटल ट्रीटमेंट तथा अन्य उपचारों के दौरान हवा में एरोसोल पार्टिकल्स के मिलने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। अतः मेडिकल स्टाफ को विशेष सुरक्षा की जरूरत है।

रोम स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक साइंस के डॉ. फ्रांसेस्का कोस्टा बाइल का कहना है कि मेडिकल स्टाफ को अन्य सुरक्षा उपकरणों के अलावा गोगल्स का भी प्रयोग करना चाहिए। रिसर्चरों ने कहा कि कोविड के मरीजों के इलाज के दौरान उन सभी उपचारों से यथासंभव बचना चाहिए, जिनसे एरोसोल उत्पन्न होता हो। इस संबंध में उन्होंने नेबुलाइजर जैसे उपचारों का उल्लेख किया। कमरों को कीटाणु रहित करने में भी बहुत सावधानी की जरूरत है। रिसर्चरों का कहना है कि कमरों को डिसइन्फेक्ट करते वक्त अल्ट्रावायलेट सी लाइट का प्रयोग ज्यादा नहीं करना चाहिए। इस लाइट से कोविड का वायरस मर तो जाता है लेकिन इससे कमरों के अंदर ओजोन की मात्रा बढ़ जाती है, जिसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कमरों के भीतर ये रसायन विषाक्त रासायनिक क्रियाएं उत्पन्न करते हैं, जिनसे दूसरे प्रदूषक तत्व उत्पन्न होते हैं। ये मनुष्य के स्नायु तंत्र और फेफडों को क्षति पहुंचाते हैं।

रिसर्चरों की अंतर्राष्ट्रीय टीम ने इस बात पर जोर दिया है कि भीतरी हवा के जरिए वायरस का प्रसार रोकने के लिए अस्पतालों और नर्सिंग होमों के स्टाफ को प्रशिक्षित करना बेहद आवश्यक है। स्टाफ को कड़े निर्देशों का पालन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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