तिरछी नज़र

फिर भी नहीं है दहेज से परहेज

फिर भी नहीं है दहेज से परहेज

शमीम शर्मा

कक्षा में अध्यापक ने जब दहेज का अर्थ पूछा तो एक बच्चे का जवाब था- जब कोई लड़का किसी लड़की को जीवनभर झेलने के लिये तैयार हो जाता है और इसके बदले उसे प्रोत्साहन स्वरूप जो राशि या उपहार मिलते हैं, उसे दहेज कहा जाता है। बहू के कम दहेज से लोग समझते हैं कि उनकी नाक कट गई है। तो क्या वे अपनी बेटी की शादी में भरपूर दहेज देकर कटी नाक को दोबारा लगाने की कोशिश करते हैं।

एकाध वक्त की रोटी मांगने वाले को तो भिखारी कहते हैं पर दहेज में कार-स्कूटर मांगने वाले इज्जतदार कहे जाते हैं। दहेज अभिशाप है, और शायद बेटी होना इसीलिये पाप है। हो सकता है कि कार-जीप के किस्से रोज़ाना ही घटते हों पर क्रेटा कार से जुड़ा एक मामला प्रकाश में ऐसा आया कि घर-घर चर्चा हो रही है। महेंद्रगढ़ के अकौदा गांव में सरकारी नौकरी पर लगे एक लड़के ने दहेज में मुंह फाड़कर अपनी तो भद पिटवाई सो पिटवाई, साथ ही दहेज समस्या की परतों से रिसती पीड़ा को भी उद्घाटित कर दिया।

सब इंस्पेक्टर की पोस्ट पर लगा एक कुंआरा क्रेटा कार की चाहत में इतना बावला हो गया कि मनपसन्द कार न मिलने के कारण रिश्ता ही तोड़ डाला। यह लड़का अगर बेरोजगार होता तो शायद जेसीबी मांग लेता। इधर एक समझदार नवयुवक की नसीहत है कि अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई से विवाह के तुरन्त बाद कभी भूलकर भी कार नहीं खरीदनी चाहिये क्योंकि लोग अक्सर गलत ही सोचते हैं। जो लड़के अपने विवाह में कार की मांग करते हैं तो उन्हें दी जाने वाली कार पर ‘ससुर की भीख’ का लेबल चिपका होना चाहिये।

एक आदमी ने अपनी पत्नी से पूछा कि अगर तुम दोबारा प्रपोज करो तो कौन से गाने पर करोगी? पत्नी बोली-इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना। विगत कुछ सालों से तो लगने लगा है कि दहेज के लोभियों को समाज ने स्वीकार कर ही लिया है। पर फिर भी दहेज से उपजी वीभत्स घटनाओं को सुनकर मुंह गालियों से भर-भर आता है।

वकील ने दहेज पीड़ित एक लड़की का तलाक करवाने के लिए पचास हजार रुपये मांगे तो लड़की का पिता बोला कि विवाह करवाने के तो पंडित ने सिर्फ पांच हजार लिये थे। वकील दुखी पिता को समझाते हुए बोला-देख लिया ना, सस्ते काम का नतीजा।

000

एक बर की बात है कि अक सुरजे मास्टर नै क्लास मैं सवाल बूझया-न्यूं बताओ अक रेडियो अर अखबार मैं के फर्क है? नत्थू भी जवाब देण नै कती तैयार बैठ्या था, बोल्या-जी रेडियो मै आप्पां परांठे नी लपेट सकते।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

शहर

View All