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अपनी भाषा का सुख

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निवेदिता श्रीवास्तव ‘निवी’

निवेदिता श्रीवास्तव ‘निवी’

यादों के गलियारे में दस्तक दे ही रही थी कि एक याद ने अनायास ही दामन थाम लिया। हिन्दी दिवस और हिन्दी भाषा से जुड़ी हुई है यह याद। एक बार हिन्दी दिवस पर अमित जी के साथ ही उनके पूर्व छात्र सम्मेलन में गयी थी। वहां सांस्कृतिक कार्यक्रम में सब की सहभागिता का आनन्द ले रही थी कि अचानक ही मंच से उद्घोषक की आवाज़ आयी, ‘अब आप सब के समक्ष मिसेज अमित अपनी एक रचना सुनाएंगी... स्वागत है आपका।’ सब के साथ मैं भी तालियां बजा रही थी उनके स्वागत में। तभी उद्घोषक ने मेरी तरफ़ देखकर हंसते हुए फिर कहा, ‘दो अमित हैं तो कन्फ्यूज़न हो रहा है न! अब मैं अलग तरह से बुलाता हूं... आइये मिसेज बमबम।’ दरअसल मेरे पति को उनके मित्र ‘बमबम] कहते हैं। बहरहाल इस अचानक आये बाउंसर को झेलते हुए मोबाइल की तलाशी ली और एक रचना सुना दी। और हां! तालियां भी बटोर लीं। बाद में हम सब बातें कर रहे थे तो एक महिला एकदम चुप बैठी बस सुन रही थीं। एकाध बार उनको भी बातों में शामिल करने का प्रयास किया, पर वह प्यारी सी मुस्कान दे चुप ही रह गईं। थोड़ी देर बाद अकेले मिलते ही बातें करने लगीं और बोली, ‘असल में मुझे अंग्रेजी नहीं आती। यहां अधिकतर वही बोलते हैं तो मैं चुप ही रहती हूं।’ मैंने उनसे बातें की और मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया। मैंने उनसे कहा, ‘मैं भी हिन्दी ही बोलती हूं।’

बातों-बातों में ही पता चला कि उनका और मेरा मायका एक ही जगह पर है, गोरखपुर! मैंने छूटते ही कहा, ‘का बहिनी अब ले छुपवले रहलू।’ वो एकदम ही संकुचित हो गईं, ‘अरे ऐसे न बोलिये, सब इधर ही देख रहे हैं।’ मैंने उनको समझाया कि अपनी भाषा अपनी ही है, इसमें कोई शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए। फिर मैं भोजपुरी ही बोलती रही और वो हिन्दी। इस तरह उनकी अंग्रेजी में न बोल पाने की हिचक थोड़ी कम हुई। उस शाम और मेरे इस तरह बिंदास भोजपुरी और हिन्दी बोलने से हमारे समूह को उनके रूप में एक और हिन्दी की कवयित्री मिल गयी। असल में भाषा संबंधी कोई अड़चन आये तो संकोच से काम नहीं चलता। आप अपनी भाषा में संप्रेषण करेंगे तो उसका आनंद ही कुछ और है।

साभार : निवेदिता-माईस्पेस डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

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