फिर राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में पाक

कसौटी पर लोकतंत्र

फिर राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में पाक

जी. पार्थसारथी

जी. पार्थसारथी

पाकिस्तान में लोगों ने उस वक्त राहत महसूस की थी जब अविश्वास प्रस्ताव से इमरान खान की सरकार गिर जाने के बाद शाहबाज़ शरीफ ने सत्ता संभाली थी। इमरान खान ने गलतियां भी खूब की थीं। उन्होंने जनरल बाजवा के नेतृत्व वाले फौजी प्रतिष्ठान की नाराज़गी मोल ली, रूस जाकर पुतिन के साथ पींगें डालने की एवज़ में अमेरिका भी पीछे पड़ गया। हालांकि अमेरिका का संबंध पाकिस्तानी सेना और आईएसआई से सदा बहुत अच्छा रहा है। 

इसी बीच शाहबाज़ शरीफ सरकार को गंभीर घरेलू समस्या का सामना करना पड़ गया। शाहबाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में केस दर्ज हो गया है। वैसे भी मुस्लिम लीग के सर्वेसर्वा पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ हैं, जो इन दिनों लंदन में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी बीच शाहबाज़ शरीफ के बेटे जो पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री हैं, पर भी भ्रष्टाचार का दोष लगा है। इसलिए पाकिस्तानी सेना और न्यायपालिका के बीच गुप्त तालमेल होने की पूरी संभावना है। कहा जाता है, न्यायाधीशों के जरिए सेना राजनेताओं और पार्टियों पर दबाव बना रही है। 

इन अनिश्चितताओं में और इफाजा 29 नवंबर को जनरल बाजवा की आगामी सेवानिवृत्ति से हो सकता है। यह सब हालात पाकिस्तान को अनिश्चितता की मझधार में डाल रहे हैं, बेशक ऊपरी तौर पर लगे कि बाजवा के उत्तराधिकारी की नियुक्ति नियत समय पर हो जाएगी। अगले सेना प्रमुख के लिए इमरान खान की पसंद पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. फैज अहमद थे, लेकिन सेनाध्यक्ष बनने का उनका मौका बहुत कम है। जहां इमरान खान को आम चुनाव करवाने की बहुत जल्दी लगी हुई है वहीं सेना के शीर्ष जनरल फिलहाल शीघ्रता के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि निकट भविष्य में यदि चुनाव हुए तो इमरान खान की फिर से प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावना है। किंतु फिर इमरान खान की अपनी समस्याएं हैं। वे अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन को फूटी आंख नहीं भाते। इसके अलावा, यूएई और सउदी अरब जैसे महत्वपूर्ण खाड़ी देशों की नाराजगी भी आड़े आती है। 

पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के बीच सेना चाहेगी कि मुल्क की दशा-दिशा तय करने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहे। हालांकि भावी आम चुनाव, जो अक्तूबर, 2023 में होने हैं, के बारे में यह कयास लगाना जल्दबाजी होगी कि तब तक सेना और इमरान खान पुनः नजदीक आ जाएंगे। पाकिस्तान के अंदरूनी हालात में दिलचस्पी लेने से अलग रहकर भारत ने समझदारी की है। अफगान सीमा से सटे खैबर पख्तूनवा इलाके में, पाकिस्तान को अपनी नीतियों के परिणाम में पश्तूनों की प्रतिक्रिया झेलनी पड़ रही है, वहां तहरीक-ए-तालिबान ऑफ पाकिस्तान नामक चरमपंथी गुट पाकिस्तान की संप्रभुता को चुनौती दे रहा है। इसके अलावा सत्तासीन तालिबान सरकार को यह एतराज भी है कि भारत-अफगान संबंध बनाने में पाकिस्तानी नीतियों का क्या काम। बलूचिस्तान में भी पाकिस्तानी संप्रभुता को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि अपने प्राकृतिक स्रोतों का निरंतर दोहन किए जाने से स्थानीय बलूचों में असंतोष है। ग्वादर बंदरगाह के प्रबंधन पर काबिज चीनियों के घमंडी और तिक्त रवैये की वजह से यह नाराजगी और गहरी हो रही है। पाकिस्तान को ड्यूरंड सीमारेखा के पार वाले अफगान पश्तून इलाके से भी चुनौतियां पेश हैं। 

फिलवक्त पाकिस्तान का मुख्य ध्यान विदेशी आर्थिक मदद पाने पर केंद्रित है ताकि मुल्क को दिवालिया होने से बचाया जा सके। एक हालिया संगोष्ठी ‘क्या पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था अबाध नीचे गिर रही है’, आयोजित हुई। इसमें पूर्व वित्त मंत्री डॉ. हफीज़ पाशा ने शीषर्क से सहमति जताते हुए कहा कि जहां पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा कोष घटकर 10 बिलियन डॉलर के आसपास बना हुआ है और वार्षिक विकास दर गिरती जा रही है वहीं भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 600 बिलियन डॉलर और विकास दर 6-8 फीसदी है, इसी तरह बांग्लादेश के पास 45 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा और 6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पादकता दर है। पिछले पांच साल में केवल चीनी कंपनियों ने पाकिस्तान में निवेश किया है। 

चीन हालांकि पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय कार्रवाई बल की निरंतर पड़ताल से बचाने की जुगत में है। 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में भूमिका के लिए केवल लश्कर-ए-तैयबा के 70 वर्षीय सरगना हफीज़ मोहम्मद सईद की गिरफ्तारी और 20 साल की सज़ा देना शायद ही असरदायक हो। यह ‘कैद’ नि:संदेह विश्व जनमत को भरमाने के लिए है। पाकिस्तान के ‘सदाबहार’ दोस्त चीन ने हफीज़ सईद के उप-सरगना रहमान मक्की को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने वाले प्रयासों में अड़ंगा लगा रखा है। 

विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने भारत के साथ संबंध सुधारने की वकालत करते हुए कहा है कि पाकिस्तान सीमा पारीय आतंकवाद को मदद जारी रखने के नतीजे में दुनिया में अलग-थलग पड़ चुका है। आतंकवाद को बढ़ावा देने की बड़ी कीमत चुकाने का दंश अब पाकिस्तान को महसूस हो रहा है। इसलिए यहां महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान के साथ आवागमन, व्यापार और संवाद के चैनल खुले रखे जाएं। यह करना फायदेमंद होगा, ठीक इसी समय उच्च स्तर पर राजनयिक राब्ता बनाने और संभावित परस्पर सहयोग हेतु दोनों ओर के उच्चायुक्तों की नियुक्तियां बहाल की जा सकती हैं। हालांकि भारत सीमा-पारीय आतंकवाद पर कड़ा प्रतिकर्म करने का विकल्प सदा खुला रखे। इस बीच, एक नया ‘क्वाड’ बनने का आसार है, जिसमें यूएई, इस्राइल, अमेरिका और भारत होंगे। इससे पाकिस्तान के पश्चिमी पड़ोस में तेल-संपन्न इलाके में नया सामरिक समीकरण बनने जा रहा है। 

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