नाबालिगों से दुराचार

कानूनी चुनौती के साथ सामाजिक समस्या भी

कानूनी चुनौती के साथ सामाजिक समस्या भी

अनूप भटनागर

नाबालिग से बलात्कार और हत्या के अपराध में दोषियों को मौत की सज़ा सुनाये जाने के बावजूद देश में बच्चियों से दुष्कर्म, हत्या तथा ऐसे अपराधों में कमी नहीं आना चिंताजनक है। इस तरह के अपराधों की जांच में सामने आ रहा यह तथ्य भी परेशानी वाला है कि इस तरह अमानवीय और बर्बरतापूर्ण अपराध करने वाले अधिकांश आरोपी रिश्तेदार या परिचित ही हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती बच्चियों और किशोरियों को रिश्तेदारों तथा परिचितों की कुदृष्टि और हवस से बचाना है। अब बच्चों को अपने घरों में ही सबसे ज्यादा असुरक्षित समझा जाने लगा है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 3,189 नाबालिग बच्चों से दुष्कर्म और यौन शोषण करने वाले परिचित लोग थे।

इसके अलावा, इस तरह के अपराध करने वाले विकृत मानसिकता के संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करके उनका पुनर्वास करने की भी आवश्यकता है। देश में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण कानून में 2019 में संशोधन करके इसमें सज़ा को कठोर बनाने के बावजूद विकृत मानसिकता वाले अपराधियों में किसी प्रकार का भय नहीं है। अधिकांश राज्यों में नाबालिगों को हवस का शिकार बनाने और उनकी हत्या करने के जुर्म में पॉक्सो अदालतें दोषियों को मौत की सज़ा देने में संकोच नहीं कर रही हैं।

यही नहीं, किशोरियों से बलात्कार के अनेक मामलों में अदालतें दोषियों को सात साल से लेकर 20 साल तक या फिर जीवनपर्यंत उम्र कैद की सज़ा दे रही हैं। इसके बावजूद ऐसे अपराधों में कोई विशेष कमी नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि नाबालिग लड़कियों से बलात्कार की बढ़ती घटनाएं कानून व्यवस्था की समस्या से कहीं ज्यादा सामाजिक समस्या बनती जा रही है। इस जघन्य अपराध की शिकार बच्चियां मानसिक संताप से जूझ रही होती हैं और इससे उबरना उनके लिये बहुत ही मुश्किल होता है। निश्चित ही यह चिंताजनक स्थिति है। इसके अलावा एक और स्थिति चिंताजनक है, वह है नाबालिग बलात्कार पीड़िता के गर्भपात के लिये अदालतों में पहुंच रहे मामलों की संख्या में वृद्धि। बलात्कार की वजह से गर्भवती हुई नाबालिग लड़कियों के गर्भपात के लिए इलाहाबाद, मद्रास और केरल सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में मामले पहुंच रहे हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर राहत देने का निर्णय ले रहे हैं।

हाल ही में केरल उच्च न्यायालय ने बलात्कार की शिकार नाबालिग लड़कियों के गर्भपात की अनुमति के लिए बढ़ते मामलों पर भी चिंता व्यक्त की थी। अकेले सितंबर महीने में ही उच्च न्यायालय में इस तरह के कम से कम तीन मामले पहुंचे थे। इसी तरह, केरल उच्च न्यायालय ने मई, 2020 से जनवरी, 2021 के दौरान बलात्कार की शिकार सात लड़कियों को राहत प्रदान करते हुए मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर गर्भपात की अनुमति दी थी। इन बलात्कार पीड़िताओं का गर्भ 20 सप्ताह से ज्यादा अवधि का था। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इन लड़कियों का यौन उत्पीड़न किया गया था।

नाबालिग बच्चों के दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं पर नियंत्रण के लिये शीर्ष अदालत ने भी इसमें हस्तक्षेप किया। इसके बाद ही सरकार ने बच्चों और किशोरियों से बलात्कार या यौन हिंसा के अपराध के मुकदमों के लिए विशेष त्वरित अदालतें गठित कीं। इस समय 26 राज्यों में 338 अदालतें सिर्फ पोक्सो के तहत दर्ज मुकदमों की सुनवाई कर रही हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार विभिन्न राज्यों में इन अदालतों में जून, 2021 तक पोक्सो के तहत 1,21,226 मुकदमे लंबित थे। इनमें से सबसे ज्यादा 39,868 मामले अकेले उत्तर प्रदेश में लंबित थे। दूसरे स्थान पर बिहार और तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश है, जिनमें क्रमश: 13,580 और 10,631 पोक्सो के मुकदमे लंबित थे। इसी तरह, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2020 में मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 3,259 नाबालिग लड़कियां लोगों की विकृत मानसिकता और हवस का शिकार हुईं। इसी तरह, नाबालिग लड़कियों से बलात्कार की महाराष्ट्र में 2,785 और उत्तर प्रदेश में 2,630 घटनाएं दर्ज की गयीं।

इस विषय पर गृह मंत्रालय की संसदीय समिति ने बजट सत्र के दौरान मार्च में सदन में पेश अपनी रिपोर्ट में दोषियों को सज़ा देने में विलंब को भी एक वजह बताया है। समिति ने इस रिपोर्ट में कहा है कि उसकी राय में महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले अपराधों पर कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियां अकेले नियंत्रण नहीं पा सकती हैं। इसलिए गृह मंत्रालय को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ तालमेल करके सामुदायिक पुलिस और जागरूकता पैदा करने वाली व्यवस्था तैयार करनी होगी। इसमें महिला संगठन और पंचायत स्तर पर प्राधिकारी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत जैसे देश में जहां कन्याओं को देवी मानकर पूजा जाता है, सरकार, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक और पुलिस मिलकर समाज को कलुषित करने वाले इस अपराध से निपटने के कारगर उपाय खोजेंगी ताकि किशोरियां को इस तरह की दरिंदगी का शिकार होने से बचाया जा सके।

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