संवेदनहीन राजनीति

जन सरोकारों की अनदेखी कब तक

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लक्ष्मीकांता चावला

लक्ष्मीकांता चावला

संसद में पिछले दिनों बजट सत्र का आगाज़ हुआ। कई दिन चला और अब कुछ दिन के पश्चात पुनः सत्र चलेगा। पंजाब विधानसभा का सत्र एक मार्च से प्रारंभ हो गया और देश की अनेक विधानसभाएं बजट सत्र को प्रारंभ कर चुकी हैं या कर रही हैं। पंजाब विधानसभा का सत्र बहुत हंगामेदार शुरू हुआ। हिमाचल का हंगामा तो हिंदुस्तान देख चुका है। सही बात तो यह है कि वहां जो कुछ हुआ, नहीं होना चाहिए था। कम से कम राज्यपाल की गरिमा का ध्यान तो सभी जनप्रतिनिधियों को रखना ही चाहिए।

अफसोस तो यह है कि आजकल लोकतंत्र के इन मंदिरों में एक-दूसरे के दोष गिनाए जाते हैं। अगर एक प्रदेश में कोई वीभत्स अपराध हो गया तो उस पर लज्जित होने की जगह सरकारी उत्तर यह रहता है कि जहां विपक्ष की पार्टी सत्ता में है वहां तो इससे ज्यादा अपराध हुए। यह नहीं कहा जाता कि वह नहीं होना चाहिए, अपितु एक-दूसरे के दोष निकालना, पगड़ी उछालना, धक्का-मुक्की करना और खबरों में छाए रहने के लिए संसद और विधानसभा में कुछ भी कर देना, कुछ भी कह देना, आज का दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है।

देश में बेरोजगारी है, महंगाई है। देश के करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें सरकारी कानून बनने के बाद भी न्यूनतम वेतन नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट चाहे यह निर्णय दे चुका है कि समान काम के लिए समान वेतन मिले, पर इस आदेश को राजनेताओं ने हवा में उड़ा दिया। पहले भरोसा देकर लोगों का विश्वास जीतना और फिर उस विश्वास को पूरी तरह तोड़ देना आज की राजनीति और जनप्रतिनिधियों का काम है। महंगाई बहुत हो गई, पर वास्तव में कुछ नहीं होगा क्योंकि जो संसद और विधानसभाओं के अंदर बैठे हैं, उनके अपने जीवन और परिवार पर इस महंगाई का कोई असर नहीं पड़ता।

अकाली नेताओं ने अपने शासनकाल के दस वर्षों में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों को स्थायी करने के लिए और नियमानुसार पूरा वेतन देने के लिए जितना शोर मचाया था, वह पूरा क्यों नहीं कर पाए। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में इन्हीं कर्मचारियों के लिए बड़े सब्जबाग दिखाए थे। क्या कांग्रेस ने पंजाब के अस्थायी कर्मचारियों को जो हरियाली दिखाई थी, वह कब ला पाएगी। नगर निगमों और नगर परिषदों के चुनाव के दिनों में सरकारी तंत्र का जो दुरुपयोग हुआ, सबने देखा। अकाली नेताओं ने इसके लिए बहुत शोर मचाया। पांच वर्ष पहले इन्हीं चुनावों में कांग्रेस वाले इसी प्रकार सत्ता के दुरुपयोग, नामांकन रद्द करवाने और वोटरों को धमकाने की बात कहते थे। याद होगा मालवा क्षेत्र में एक जिले विशेष में क्या हुआ था। क्या सभी राजनीतिक पार्टियां मिलकर विधानसभा में यह संकल्प ले सकती हैं कि सत्ता में कोई भी हो, लोकतंत्र पर लाठी नहीं चलाई जाएगी।

आज पंजाब सरकार से और सभी पक्ष-विपक्ष के नेताओं से जनता की ओर से एक अपील है कि इस विधानसभा सत्र को चलाने में करोड़ों रुपये खर्च होंगे। विधायकों को मोटा टीए-डीए मिलेगा, पर उसका जनता को कोई लाभ दे पाएंगे? क्या यही निर्णय कर देंगे कि सभी कर्मचारियों को एक जैसे कार्य के लिए एक जैसा वेतन, छुट्टी, मेडिकल सुविधा दी जाएगी? क्या पंजाब के किसी पुलिस स्टेशन में, किसी तहसील में, किसी ईटीओ, डीटीओ के दफ्तर में भ्रष्टाचार नहीं रहेगा? पंजाब के सभी राजनीतिक दल अगर संकल्प के साथ निर्णय ले लेते हैं तब भी यह समझा जाएगा कि जनप्रतिनिधि ही विधानसभा में बैठे हैं। सबसे बड़ी बात पंजाब के विभिन्न विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की चक्की में जनता पिस रही है और पिसने वाले इन नेताओं के मतदाता हैं, इन्हें माननीय बनाने वाले हैं। उनकी दुर्गति से अगर इन्हें कोई दर्द होता है तो वे इस विधानसभा सत्र में उनके लिए भी आवाज उठाएं।

आज तक का अनुभव तो यही है कि पंचा दा केहा सिर मत्थे, परनाला उत्थे दा उत्थे। यूं भी कह सकते हैं कि जनता मेड लीडरों को रंज तो बहुत है, पर केवल भाषणों में। जनता के लिए जो कुछ है, वह पांच वर्ष बाद चुनावी भ्रष्टाचार में प्रकट होगा। कहीं शराब बंटेगी, कहीं नोट, कहीं फोन और स्कूटी। बेचारी गरीब जनता उस एक दिन की दीवाली को ही अपना भाग्य समझकर फिर विश्वास तोड़ने वालों को सत्ता के शिखरों पर पहुंचाने को मजबूर हो जाती है। भारत की संसद से लेकर विधानसभाओं तक उनकी बात नहीं होती, जिनके लिए यह कहा जाता है कि राज्य जनता के लिए है, जनता के द्वारा है। जनता तो इस राज्य के द्वार तो दूर, दहलीज से भी बाहर है।

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