अंतर्राष्ट्रीय समीकरणों में संतुलन की कवायद : The Dainik Tribune

अंतर्राष्ट्रीय समीकरणों में संतुलन की कवायद

अंतर्राष्ट्रीय समीकरणों में संतुलन की कवायद

जी. पार्थसारथी

पिछले सालों में भारत ने अपनी सामरिक पहुंच का विस्तार सामान्य समुद्रीय सरहदों से परे जाकर पूरब में मलक्का जलसंधि तो पश्चिम में होरमुज़ जलसंधि के पार तक किया है। फिलहाल भारत का ध्यान-केंद्र फारस की खाड़ी के तेल-संपन्न मुल्क और पूर्व सोवियत संघ के घटक रहे मध्य एशियाई गणतंत्रों से रिश्ते प्रगाढ़ करना है। पिछले दशकों के दौरान इन मुल्कों के साथ संबंधों में खासी तरक्की हुई है। आसियान संगठन के सदस्यों जैसे कि प्रशांत महासागर के तट से लगते ऑस्ट्रेलिया और जापान तथा मलक्का जलसंधि क्षेत्र के दक्षिण कोरिया के साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं और लगातार होने के अलावा नए आयाम जुड़ रहे हैं। पिछले सालों के दौरान तेल-संपन्न अरब राष्ट्रों में यूएई से लेकर सऊदी अरब के साथ हमारे संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं, इसी बीच ईरान के साथ रहे मधुर संबंध पहले की भांति कायम हैं।

तथापि भारत ने यूरेशिया को लेकर खुला रुख अपनाया है। जहां शंघाई सहयोग संगठन में रूस और चीन के साथ समझ बनाई है वहीं ठीक इसी वक्त भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान के साथ मिलकर क्वाड नामक गुट बनाया है। भारत यू2आई2 नामक गुट का भी सदस्य है, जिसमें अमेरिका, यूएई और इस्राइल हैं। क्वाड और यू2आई2 गुटों के निर्माण के पीछे सुरक्षा विशिष्ट पहलू है। पिछले कुछ दिनों से अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान शंघाई सहयोग संगठन पर लगा है जिसके सदस्यों में चीन, रूस, कजाख्सतान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और भारत आदि मुल्क हैं। अगले साल भारत नई दिल्ली में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। क्वाड, यू2आई2 और शंघाई सहयोग संगठन, ये सब हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र और यूरेशिया तक भारत की पहुंच बनाने वाली नीति के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

हाल ही में समरकंद में संपन्न शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में यूक्रेन के मुद्दे ने भारत को यूरेशिया के रूस और इसके पड़ोसी मध्य एशियाई गणतंत्र, ईरान और चीन के साथ वार्ता का उपयोगी मौका दिया। प्रधानमंत्री ने यूक्रेन युद्ध सहित हालिया और अभूतपूर्व घटनाक्रमों से विश्व को दरपेश चुनौतियों पर अपने विचार प्रकट किए। इसमें यूक्रेन-रूस टकराव का संदर्भ भी था, जिसके चलते वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान पड़ा है, खासकर कृषि और पेट्रोलियम पदार्थों में। शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति पुतिन के साथ अपनी मुलाकात में प्रधानमंत्री ने यूक्रेन युद्ध का असर एशियाई और अफ्रीकी मुल्कों के महत्वपूर्ण जीवनोपयोगी अवयव जैसे कि अनाज, ईंधन पर पड़ने की चिंता से अवगत कराते हुए स्पष्ट किया ‘मैं जानता हूं आज का युग युद्धों का काल नहीं है और यूक्रेन युद्ध का हल लोकतांत्रिक, राजनयिक और संवाद के जरिये होना चाहिए। विश्व, विशेषकर विकासशील देशों के सामने, सबसे बड़ी चिंता खाद्यान्न, ईंधन, खाद की सुरक्षा को लेकर बन गई है। हमें इन समस्याओं का हल निकालना ही होगा और आपको इन पर विचार करना ही है।’ इन घटनाक्रमों ने भारत को अपना अन्न निर्यात बढ़ाने का मौका दिया है, जैसा कि यू2आई2 संधि में उल्लेख किया गया है। रोचक यह कि पुतिन ने माना है कि यूक्रेन में चल रहे युद्ध को लेकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी चिंता और संशय जताए हैं।

भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध और वहां भूमिका निभा रही मुख्य ताकतों पर अपने विचार एकदम साफ शब्दों में दिए हैं। इस बात की संभावना कम है कि इस विषय पर भारत मुख्य शक्तियाें जैसे कि अमेरिका, चीन और रूस को लेकर रुख बदलेगा। भारत ने शंघाई सहयोग संगठन में ईरान की आमद और इसके रिश्ते पड़ोसी सऊदी अरब, यूएई और अन्य मुख्य अरब मुल्कों के साथ सुधरने का स्वागत किया है। बाइडेन प्रशासन के कुछेक हालिया निर्णयों पर नापसंदगी के बावजूद अमेरिका के साथ भारत की निकटता कमोबेश पहले जितनी कायम है।

प्रधानमंत्री मोदी की टिप्पणी पर राष्ट्रपति पुतिन का उत्तर रोचक रहा। उन्होंने कहा, ‘भारत को रूसी खाद की आपूर्ति आठ गुणा बढ़ी है, वहीं तेल एवं गैस क्षेत्र और अणु शक्ति चालित उद्योग में संयुक्त विशाल-स्तरीय परियोजनाओं का क्रियान्वयन तसल्लीबख्श हो रहा है।’ उन्होंने वीसा मुक्त आवागमन पर द्विपक्षीय समझौते के लिए वार्ता प्रक्रिया चलाने की सलाह दी है। उनके विचारों में सकारात्मकता झलकना महत्वपूर्ण है। भारत वर्तमान में रूस से वाजिब दामों पर काफी बड़े पैमाने पर तेल, खाद और प्राकृतिक गैस का आयात कर रहा है, जो हमारी आर्थिक प्रगति में सहायक है।

रूस के प्रति अमेरिकी रुख के बावजूद भारत के संबंध अमेरिका के साथ उत्तरोत्तर प्रगाढ़ हो रहे हैं, हालांकि अमेरिका की वर्तमान नीतियों के कुछ पहलुओं पर भारत की भौंहें तनी हैं। हालिया मतभेदों में सबसे गौरतलब है पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार और रक्षा उपकरणों की आपूर्ति। 14 अप्रैल को पेंटागन की घोषणा अनुसार, बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए 45 करोड़ डॉलर मूल्य के स्पेयर पार्ट्स और उपकरण देने मंजूर किए हैं। अमेरिकी प्रवक्ता ने दावा किया, ‘पाकिस्तान का एफ-16 कार्यक्रम जारी रहना बृहद अमेरिका-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है। एफ-16 बेड़ा पाकिस्तान के आतंकरोधी अभियानों में सहायक है और हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान तमाम आतंकियों के विरुद्ध सतत कार्रवाई जारी रहेगा।’ जबकि सच्चाई यह है कि बालाकोट प्रसंग में भारत ने अमेरिका का दिया एफ-16, जो कि आधुनिक एमराम मिसाइल से लैस था, मार गिराया था। अमेरिकी हथियारों का भारत के विरुद्ध इस्तेमाल वह चिंता है जो भारतीय मानस में स्थाई रूप से उकरी हुई है।

पाकिस्तान को रक्षा सहायता में बढ़ोतरी करने की अमेरिकी घोषणा को सिर्फ हैरानीजनक ही कहा जाएगा। यह वह वक्री उदाहरण है जिसकी बाइडेन प्रशासन से उम्मीद थी। ओबामा सरकार में उप-राष्ट्रपति वाले दिनों से बाइडेन के बारे में माना जाता है कि वे पाकिस्तान के ‘चार सितारा जनरलों’ के प्रति आसक्ति रखते हैं। 12 जनवरी, 2011 के दिन, वे खुद इस्लामाबाद से रावलपिंडी के सेना-मुख्यालय जाकर तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल कयानी से मिले थे, जबकि प्रोटोकॉल से होना उलटा चाहिए था। रोचक है कि पाकिस्तान को सैन्य सहायता की हालिया घोषणा राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तान को प्रस्तावित 2 बिलियन डॉलर मूल्य वाला सौदा खारिज किए जाने के चार साल बाद आई है। ट्रंप को पाकिस्तान की तालिबान से साठ-गांठ को लेकर कोई भ्रम नहीं था, जबकि दूसरी ओर लगता है बाइडेन के मन में पाकिस्तानी जनरलों को लेकर आदर है। आज अमेरिका-पाकिस्तान संबंध पाकिस्तानी राजनेताओं द्वारा तय और क्रियान्वित न होकर सेना प्रमुख जनरल बाजवा चला रहे हैं, जिनके साथ बरतने में अमेरिकी अधिकारी सदा खुशी-खुशी तत्पर रहते हैं!

लेखक पूर्व वरिष्ठ राजनयिक हैं।

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