ग्लेशियर संकट

मानव अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी

मानव अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी

ज्ञानेन्द्र रावत

ज्ञानेन्द्र रावत

पृथ्वी के तापमान में असंतुलन से मौसम में हो रहे बदलाव से समूची दुनिया चिंतित है। लोग कहीं वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के खिलाफ नये सिरे से कदम उठाने और विश्व नेताओं पर दबाव बनाने के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। कहीं बच्चे मानव शृंखला बना रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपील करते नजर आ रहे हैं। संदेश यही कि चेत जाओ, अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। इस संकट के निदान की दिशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ सहित पेरिस, कोपेनहेगन, वारस, दोहा हो या कानकुन आदि, समय-समय पर दुनिया के देशों ने गहरी चिंता जतायी है। दुनिया के देशों से कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश की अपील के साथ कुछ प्रस्ताव भी पारित किये गए। लेकिन हालात में बदलाव नहीं आया है। साल-दर-साल गर्मी तो इतनी बढ़ती जा रही है, बारिश भी हो रही है लेकिन कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं हो रही है। वैज्ञानिकों की राय है कि इसके लिए भूमण्डलीय उष्मीकरण और वातावरण में बढ़ता प्रदूषण पूरी तरह जिम्मेवार है। बढ़ते तापमान से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसका भीषण दुष्प्रभाव पानी के संकट के रूप में सामने आयेगा।

एशिया में तिब्बत के पठारों पर स्थित ग्लेशियर किलियान के इलाके को दुनिया के तीसरे ध्रुव के नाम से भी जानते हैं, वो तेजी से पिघल रहा है। इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते प्रदूषण को ही जिम्मेवार बताया जा रहा है। यह बीते लगभग पचास सालों में 450 मीटर पीछे चला गया है। उत्तरी-पूर्वी किनारे के कुल मिलाकर करीब 12 किलोमीटर से अधिक के दायरे में फैले लाओहुगोउ ग्लेशियर की साल 1950 से पिघलने की गति में काफी तेजी आई है। यह 800 किलोमीटर की पर्वतीय शृंखला का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह सात फीसदी की रफ्तार से हर साल पिघल रहा है। नतीजतन अभी तक 13 मीटर की मोटी बर्फ की परत पूरी तरह गायब हो चुकी है। असलियत में किलियान रेंज में फैले कुल 2684 ग्लेशियरों के लिए यह बहुत बड़े खतरे का संकेत है। वैज्ञानिक किनजियांग का कहना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से मक्का और प्याज उगाने वाले किसानों के साथ-साथ मवेशियों को भी पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा। इसका कारण बारिश और बर्फबारी में सामान्य से भी ज्यादा कमी आ जाना है।

दरअसल, ग्लेशियर से बर्फ तेजी से ज्यादा मात्रा में पिघलकर बह जाती है। इससे नीचे की कमजोर मिट्टी इस बर्फ के पानी के साथ फिसलकर कई नीचे के स्थानों पर झीलें बनाती जाती है। यही नीचे पहुंचते-पहुंचते उग्र रूप धारण कर लेती हैं। उत्तराखण्ड की मौजूदा त्रासदी के पीछे यह भी एक अहम कारण रहा है।  फिर निचले इलाके में बनी परियोजनाएं इसी प्रवाह की अवरोधक बनीं, जिसने इसकी मारक क्षमता को और बढ़ाने का काम किया। यदि तापमान के आंकड़ों की बात करें तो 1950 के दशक में इस इलाके के तापमान में औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। यदि चीन की एकेडमी ऑफ साइंस की मानें तो 1990 से 2010 के बीच यहां ग्लेशियर 50 फीसदी की रफ्तार से पिघले हैं।

हिमालयी ग्लेशियरों की बात करें तो ये तेजी से पिघल रहे हैं। अध्ययन सबूत हैं कि 16वीं शताब्दी के बाद के 360 सालों में हर साल गंगोत्री ग्लेशियर 63 मीटर पीछे खिसकता था जो अगले 80 सालों में 1.9 किलोमीटर पीछे खिसक गया है। दरअसल, ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

उत्तराखण्ड की मौजूदा त्रासदी की तरह ही कभी भी अलास्का का बैरी आर्म ग्लेशियर भी इस समस्या से दो-चार हो सकता है। यह बेहद संकरे समुद्री रास्ते के ऊपर बना है, जहां बर्फ के ज्यादा वजन के कारण नीचे की मिट्टी खिसकने से उसके टूटने का खतरा पैदा हो गया है। यदि ऐसा हुआ तो इसका मलबा समुद्र में गिरेगा। नतीजतन भयंकर सुनामी आयेगी, जो समुद्र और आसपास के इलाकों में तबाही मचाने के लिए काफी है। ऐसी सुनामी पश्चिमी ग्रीनलैण्ड में 2017 में आयी थी जब लाखों टन धूल-कीचड़ फैलने से यहां भारी तबाही हुई थी।

ग्लेशियरों से निकली नदियां जीवनदायिनी हैं, जिनके बिना जीवन असंभव है। ग्लेशियरों के पिघलने की दर प्रति वर्ष हर साल लगातार बढ़ती ही जा रही है। यह अगर इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो एक दिन इनका अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। उस स्थिति में पेयजल समस्या तो भयावह रूप धारण कर ही लेगी, पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके जैव ईंधन के प्रचुरता से प्रयोग किये जाने की स्थिति में निश्चित ही ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते प्रभाव में कमी आयेगी। इससे जहां प्रकृति को राहत मिलेगी, पर्यावरण सुधरेगा, वहीं प्राणी मात्र के स्वास्थ्य में सुधार की आशा भी बलवती होगी।

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