एकदा

सादगी और त्याग

सादगी और त्याग

बात उन दिनों की है जब लाल बहादुर शास्त्री जेल में थे। जेल से उन्होंने अपनी माताजी को पत्र लिखा कि 50 रुपये मिल रहे हैं या नहीं और घर का खर्च कैसे चल रहा है? मां ने पत्र के जवाब में लिखा कि 50 रुपये महीने मिल जाते हैं। हम घर का खर्च 40 रुपये में ही चला लेते हैं। तब बाबू जी ने संस्था को पत्र लिखकर कहा कि आप हमारे घर प्रत्येक महीने 40 रुपये ही भेजें। बाकी के 10 रुपये दूसरे गरीब परिवार को दे दें। जब यह बात पंडित जवाहर लाल नेहरू को पता चली तो वह शास्त्री से बोले कि त्याग करते हुए मैंने बहुत लोगों को देखा है, लेकिन आपका त्याग तो सबसे ऊपर है। इस पर शास्त्री पंडितजी को गले लगाकर बोले, ‘जो त्याग आपने किया उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं है, क्योंकि मेरे पास तो कुछ है ही नहीं। त्याग तो आपने किया है जो सारी सुख-सुविधा छोड़कर आजादी की जंग लड़ रहे हैं।क्या ऐसी सादगी और ऐसा त्याग आज संभव है?’

प्रस्तुति : देवेन्द्रराज सुथार 

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