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झुक गया आसमान

झुक गया आसमान

शारा

कभी राजेंद्र कुमार की जबरदस्त फैन रहीं और उन्हीं से शादी की जिद करने वालीं सायरा बानो को अपने फिल्मी करिअर के शुरुआती दौर में ही राजेंद्र कुमार के साथ काम करने का मौका मिल गया। संयोग ऐसा बना कि फिल्म ‘झुक गया आसमान’ बेहतरीन चल निकली। हॉलीवुड की एक फिल्म की तर्ज पर बनी इस फिल्म में बॉलीवुड के सभी मसालों का ऐसा छौंक लगाया गया कि इसके रिलीज होने के 10 साल बाद हॉलीवुड में इसी तर्ज पर फिर एक फिल्म बनी। बेहतरीन लोकेशन और गीत संगीत से भरपूर फिल्म ‘झुक गया आसमान’ को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया। 

अजीब-सी स्टोरी है इस फिल्म की, कुछ-कुछ हास्यास्पद-सी, रहस्यमई-सी और कुछ यथार्थ से परे। लेकिन इस फिल्म को ट्रीटमेंट कुछ इस कदर दिया गया है कि इसे देखकर, ऐसा कुछ नहीं लगता जो अजीब हो। हॉलीवुड की 1941 में रिलीज ‘हेयर कम्ज़ मिस्टर जॉर्डन’ की तर्ज पर बनी यह हिंदी फिल्म 1968 में रिलीज हुई थी। रिलीज होते ही इसने बॉक्स ऑफिस खचाखच भर दिए। इसे बॉलीवुड सेल्युलाइट पर उतारने के लिए इसके निर्देशक लेख टंडन ने उतना ही बॉलीवुड मसालों का छौंक लगाया जितनी कि फिल्म को दरकार थी। थोड़ा-थोड़ा सब कुछ चाहे वह रोमांस हो, सस्पेंस, हत्या या हिंसा, कॉमेडी या गीत-गाने। सबका ऐसा सुमेल है कि फिल्म सुपरहिट की कैटेगरी में शुमार हो गई। इस फिल्म की ख्याति देखिए कि हॉलीवुड में भी यह फिल्म 1978 में ‘हैवेन कैन वेट’ के नाम से दोबारा बनी, लेकिन इससे पहले लेख टंडन अपने मंजे निर्देशन से इसे बना चुके थे। यह फिल्म खूब चली। जिस अनुपात में बॉलीवुड मिर्ची-मसाला डालकर हॉलीवुड सिनेमा की नकल की गई और उसे जिस शिद्दत से हिंदी सेल्युलाइट पर दर्शकों को परोसा गया। इस पेशकश को देखते हुए वर्तमान की निर्देशक फराह खान को कुछ टिप्स ले लेने चाहिए जो ‘मैं हूं ना’ तथा ‘ओम शांति ओम’ जैसी फिल्में बना चुकी हैं। ‘झुक गया आसमान’ में राजेंद्र कुमार व राजेंद्रनाथ हैं तथा साथ में है सायरा बानो। उन्होंने ताजा-ताजा फिल्मों में कदम रखा ही था। संयोग देखिए कि उन्हें उन्हीं के पसंदीदा हीरो के साथ काम करने का अवसर मिल गया। उन दिनों राजेंद्र कुमार जुबली कुमार के नाम से तो जाने जाते थे, युवा लड़कियों के दिलों में भी बसते थे। यही वह एक्टर हैं, जिसके साथ सायरा बानो शादी करने की जिद किया करती थीं। जिद पर अडिग देखकर उनकी मां नसीम बानो उन्हें समझाने-बुझाने के लिए दिलीप कुमार के घर ले गई थीं और समझाने के चक्कर में दिलीप कुमार स्वयं भी समझ बैठे कि मुझे इसी सिरचढ़ी जिद्दी लड़की के साथ जिंदगी बितानी है। यह बात अलग है कि वह बेहद संजीदा समझदार धर्मपत्नी साबित हुईं। खैर, बात फिल्म की। यह फिल्म उनकी शुरुआती फिल्मों से एक है। फिल्म तकनीकी व शैली पक्ष से बेहद खूबसूरत बन पड़ी है। जो कसर बची, वह शंकर जयकिशन के गीतों ने पूरी कर दी। खुली जीप में रोमांस या जीवन की नायिका का तसव्वुर करते हुए ड्राइविंग में कलाबाजियां करना जैसे स्टंट जिन बॉलीवुड के कुछ हीरो ने शुरू किये थे, उनमें राजेंद्र कुमार भी एक थे। निर्देशक के विजन की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने ड्रीम सिक्वेंस को जिस ढंग से पर्दे पर उतारा है, उस दशक में ऐसा तसव्वुर करना भी मुश्किल है। चारों ओर सफेद बादलों के फाहे उड़ते हैं और ओस के माहौल में निकलते दो प्रेमीजनों के चेहरे। पेड़-पौधों का रंग पिंक-सा मानो किसी पंछी के पंख हों। यह उस समय के आशिकों का स्वर्ग है और स्पॉट है दार्जिलिंग की कोई जगह। और सपने देखने वाले संजय (राजेंद्र कुमार) को सपने से जगाता है हनुमान (राजेंद्रनाथ)। इस फिल्म में अगर हास्य का मसाला नहीं होता तो यह फिल्म बकबकी लगती। इस फिल्म में राजेंद्र कुमार डबल रोल में हैं। संवाद खूब चुटीले हैं, खासकर राजेंद्रनाथ के। एक बानगी देखिए-

रामदास—‘चाहिए? टी.के. साहब आपका इंतजार कर रहे हैं।’ हनुमान—‘टी.के. कौन से टीके? माता के या कॉलरा के? फॉर व्हाट स्मॉल पॉक्स या कालरा के?’ रामदास—‘जी आपके बचपन के।’ हनुमान—‘बचपन के? वो तो मैंने लगाए थे।’

सारी स्टोरी हीरो संजय (राजेंद्र कुमार) के इर्दगिर्द घूमती है जो दार्जिलिंग में टूरिस्ट गाइड है वह अपने दोस्त हनुमान (राजेंद्रनाथ) के साथ मजे में है। दिक्कत तब होती है जब उसके जीवन में प्रिया नामक लड़की आती है। प्रिया (सायरा बानो) दार्जिलिंग में कलकत्ता से आई है लड़कियों के टूअर के साथ। ऐसे में दोनों का प्यार तो होना ही था, सो हुआ। लेकिन प्रिया को बहुत जल्दी वापस घर लौटना पड़ा क्योंकि उसके पिता साजिशन गिरफ्तार हो गए थे। प्रिया को एयरपोर्ट में छोड़ कर लौटते वक्त राजेंद्र कुमार एक्सीडेंट में मर जाता है। यमराज उसे एक ही शक्ल होने की गलतफहमी में तरुण कुमार सक्सेना समझकर धर्मराज के पास पेश करता है। जहां संजय अपनी दुखभरी कहानी कहता है। धर्मराज पिघल जाते हैं और उसकी आत्मा तरुण कुमार सक्सेना उर्फ टी.के. केशव में डालकर संजय को पृथ्वी पर भेज देते हैं। चूंकि संजय टी.के. के शरीर में आ जाता है। तो वह प्रिया के करीब हो जाता है। प्रिया अपने पिता जी के साथ कलकत्ता में रहती है, जिन्होंने कभी टी.के. के साथ बिजनेस किया था। लेकिन वह काफी ईमानदार और टी.के. काफी भ्रष्ट और बेईमान था। वह मन से टी.के. के गलत कामों को ठीक करता है। इस काम में दादी मां को भी राजदार बनाता है और चैसबोर्ड का बिजनेस करने वाले प्रेम से दूरी बनाकर रखता है जो टी.के. की हत्या की साजिश रचता है। ऐसा रोल कौन कर सकता है जाहिर है प्रेम चोपड़ा ही होंगे। अंत में संजय कुमार की चतुराई से बुरे लोग फंस जाते हैं तथा प्रेमीजन मिल जाते हैं। दर्शक/पाठक यह फिल्म जरूर देखें, अगर रिलैक्स होना है तो। अपने टाइम की ब्यूटी क्वीन कहलाई जाने वाली सायरा बानो ने अपने यौवन की शोखियां ‘उनसे मिली नजर कि मेरे होश उड़ गये’ में जिस तरह दिखायी हैं, फिल्म में उनकी सेक्स-अपील देखकर करीना कपूर या कटरीना भूल जाती है। सायरा बानो की सेंसुअल्टी के आगे शीला की जवानी लगभग फेल है।

निर्माण टीम

प्रोड्यूसर : आरडी बंसल, रमणीक लाल गोसालिया, रमेश लांबा

निर्देशक : लेख टंडन

मूल एवं पटकथा : ओंकार साहिब

संवाद : प्रयागराज

सिनेमैटोग्राफी : द्वारका दिवेचा

गीतकार : शमशुल हुडा बिहारी, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र

संगीतकार : शंकर जयकिशन

सितारे : राजेंद्र कुमार, सायरा बानो, राजेंद्र नाथ, प्रेम चोपड़ा, दुर्गा खोटे आदि।

गीत

मेरे तुम्हारे बीच : लता मंगेशकर

मेरी आंखों की निंदिया : मो. रफी, लता मंगेशकर

सच्चा है प्यार मेरा

अगर : मोहम्मद रफी

कहां चल दिये

इधर तो आओ : मोहम्मद रफी

उनसे मिली नजर

तो मेरे होश : लता मंगेशकर

किसी की जान

लेते हैं : एसएच बिहारी

कौन है जो सपनों : मो. रफी

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