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हिंदी फीचर फिल्म : खामोशी

हिंदी फीचर फिल्म : खामोशी

शारा

1970 में रिलीज ‘खामोशी’ ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म है। असित सेन (कॉमेडी करने वाला असित सेन नहीं) ने उस जमाने में ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म बनायी जब विरली-विरली रंगीन फिल्में बननी शुरू हो गयी थीं। लेकिन पैसे की अनुपलब्धता के कारण सीमित सैट-व्यवस्था या फिर कमल बोस की फोटोग्राफी के कमाल दिखाना चाहते थे वह। और इस प्रयोग में सहयोग दिया हेमंत कुमार ने फिल्म प्रोड्यूस करने की हामी देकर, फिर क्या था? एक बेहतरीन फिल्म बनकर तैयार हो गयी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि फिल्म की निर्माण टीम में एक से बढ़कर एक हीरे थे। आशुतोष मित्रा की कहानी पर बनी ‘दीप ज्वेले जाए’ बांग्ला फिल्म को आधार मानकर इसकी पटकथा स्वयं असित सेन ने लिखी थी। बांग्ला फिल्म में वहीदा रहमान वाली भूमिका सुचित्रा सेन ने अभिनीत की थी। उत्कृष्ट भूमिका के बावजूद वहीदा रहमान मानती हैं कि जो बात सुचित्रा सेन में थी वह तमाम कोशिशों के बावजूद रोल में पूरी तरह खुल नहीं पायीं। हालांकि, उनका यह रोल बेहतरीन रोल में से एक था। पाठकों को असित सेन के बारे में भी बताती चलूं, नहीं तो वह कॉमेडी वाले असित सेन को ही निर्देशक मानकर चले होंगे। असित सेन शिक्षाविद तो थे ही, बड़े अनुभवी कानूनदां भी रह चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी (जनसंघ) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन्हीं के बेटे हैं जो जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में मंत्री रह चुके हैं, जिनका निधन जम्मू-कश्मीर में हुआ था। शिक्षा और कानून में हाथ आजमाने के बाद असित सेन फिल्मी लाइन में आये। शुरुआती दिनों में वह डायक्यूमेंटरी फिल्में बनाते थे। फिर उन्होंने ममता, सफर जैसी फिल्में बनायीं।

यह फिल्म राजेश खन्ना की शुरुआती फिल्मों में से एक है। आखिरी खत फिल्म में अभिनय देखने के बाद ही वहीदा रहमान ने राजेश खन्ना का नाम असित सेन को सुझाया था। राजेश खन्ना ने अपने रोल को जो फिल्मी जामा पहनाया, खुद राजेश खन्ना ने माना कि इस किरदार ने उन्हें कई फिल्में दिलाने में मदद की। यह फिल्म एक और कारण से भी आलोचकों की तारीफ का केंद्र बनी। वह थी कमल बोस की सिनेमैटोग्राफी। कमल बोस वही हैं जिन्होंने विमल राय की बंदिनी, सुजाता, दो बीघा जमीन, देवदास और 1953 में बनी परिणीता को सिनेमैटोग्राफी से सजाया था। वह कोलकाता में विमल राय की टीम के सदस्यों में से एक थे जो न्यू थियेटर में काम करते थे और ऋषिकेश मुखर्जी और असित सेन जैसे सिनेमा विभूतियों के साथ जीवन की दूसरी पारी खेलने के लिए बम्बई टॉकीज से जुड़े थे। काबुलीवाला फिल्म की सिनेमैटोग्राफी उन्होंने ही की थी। जब विमल राय का निधन हो गया तो उन्होंने असित सेन के साथ काम करना शुरू किया था। दोनों की जोड़ी ने अनोखी रात, खामोशी और सफर आदि फिल्में बॉलीवुड को दीं। उसके बाद उन्होंने फिरोज खान के साथ मिलकर धर्मात्मा भी बनायी। फिल्म खामोशी को एक और कारण से याद किया जाता है वह है इसके गीत और इन गीतों को धुन देने वाले हेमंत कुमार। याद कीजिए वह गीत ‘हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू...’ गुलजार का लिखा यह अमर गीत इसी फिल्म का है, जिसे सुर दिया था स्वयं प्रोड्यूसर हेमंत कुमार ने। पांचों गीत खूब प्रसिद्ध हुए। असित सेन और विमल राय की टीम में बंदिनी फिल्म से शामिल हुए गुलज़ार, जिसमें उन्होंने ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत लिखा था। इस फिल्म की बढ़िया फोटोग्राफी के लिए कमल बोस को 18वें फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए सर्वोत्तम सिनेमैटोग्राफी का पुरस्कार मिला। जबकि वहीदा रहमान सर्वोत्तम एक्ट्रेस के लिए नामांकित हुई थी फिर भी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठीक ही कमाई की थी। जो रोल हेमंत कुमार का गीत ‘तुम पुकार लो’ गाते हुए खामोशी फिल्म में धर्मेंद्र ने किया था, वही रोल बांग्ला फिल्म में असित सेन ने किया था। फिल्म की कहानी में एक जगह कैमरा बालकनी में खड़ी लड़की पर फोकस होते हुए नीचे खड़ी एम्बुलेंस पर आ जाता है। एम्बुलेंस चली जाती है और लड़की शून्य को निहारती रहती है। यह लड़की कोई और नहीं है वहीदा रहमान है, जिनका फिल्म में नाम राधा है जो मैंटल अस्पताल में नर्स है, जिसका धर्मेंद्र (देव) से अफेयर (एकतरफा) हो जाता है। देव कभी राधा का पेशेंट था। सहानुभूति दिखाते वह उसे प्यार करने लगती है। वह अस्पताल में नये आये एक्यूटमैनिया के रोगी अरुण (राजेश खन्ना) का केस लेने से इसलिए इनकार कर देती है क्योंकि वह देव के केस में भी अपना व्यावासयिक जीवन अपने निजी जीवन से अलग नहीं रख सकी। लेकिन बाद में अरुण की हालत देखते हुए वह उसका केस लेने को तैयार हो जाती है।

सुलेखा नामक गायिका ने अरुण का दिल तोड़ा है, जिसे राधा अपने प्यार व देखभाल से ठीक कर देती है मगर, अपनेआप पागल हो जाती है। वह उसी कमरे में दाखिल कर दी जाती है जहां अरुण था। अरुण उसका इंतजार करने को कहता है मगर राधा तो पागल हो चुकी है। निर्देशन में भावों की बारीकियों को खासकर वहीदा रहमान की मनोवैज्ञानिकता को कैमरे में उतारना निहायत ही टेढ़ी खीर थी। मगर, कमल बोस ने इस काम को बाखूबी अंजाम दिया। मनोचिकित्सक वार्ड में नर्स की ड्यूटी देते-देते स्वयं का मरीज से जज्बाती तौर पर जुड़ जाना और मरीज के ठीक होते ही नर्स को भूल जाना कितना कष्टप्रद है? इस पुनरावृत्ति के भय से वहीदा मैनिया का केस लेना नहीं चाहती। और अंतत: वही हुआ, जिसका खदशा उसे था। वह अरुण को तो ठीक कर देती है। मगर खुद पागल हो जाती है और अपने बॉस को बार-बार कहती है कि उसने एक्टिंग नहीं की थी। इस नाम की फिल्म बाद में दो बार बन चुकी है। लेकिन विषय-वस्तु कोई और थी।

निर्माण टीम

प्रोड्यूसर : हेमंत कुमार

निर्देशक : असित सेन

मूलकथा : आशुतोष मित्रा

पटकथा : असित सेन

गीत और संवाद : गुलज़ार

संगीत : हेमंत कुमार

सिनेमैटोग्राफी : कमल बोस

सितारे : राजेश खन्ना, वहीदा रहमान, धर्मेंद्र आदि

गीत

तुम पुकार लो : हेमंत कुमार

वो शाम कुछ अजीब थी : किशोर

हमने देखी है उन आंखों की : लता मंगेशकर

आज की रात चिरागों को : आरती मुखर्जी

दोस्त कहां कोई तुमसा : मन्ना डे

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