शहीदे आजम की यादगार की अहम खोज : The Dainik Tribune

पुस्तक समीक्षा

शहीदे आजम की यादगार की अहम खोज

शहीदे आजम की यादगार की अहम खोज

राजवंती मान

समीक्षाधीन पुस्तक पत्रकार लेखक जुपिंदरजीत सिंह की अंग्रेजी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ भगत सिंह पिस्टल’ का पत्रकार शायदा बानो द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद है। भगत सिंह उन महान क्रांतिकारियों में से हैं जिसने क्रांति की अवधारणा को ही परिवर्तित कर दिया। जुपिंदरजीत सिंह की पुस्तक ‘भगतसिंह की पिस्तौल की खोज’ 9 अध्यायों में समाहित है। पुस्तक की शुरुआत भगतसिंह के बचपन से होती है जब वे 1915 में लायलपुर (अब पाकिस्तान) के बंगा गांव के खेत में लकड़ियां बोते हैं कि इनसे उपजी बन्दूकों से वह भारत आजाद कराएंगे। भगत सिंह इंकलाबी परिवार में जन्मे थे। उन्होंने उनके चाचाओं की जेल यातनाएंं देखी थी, जलियांवाला बाग हत्याकांड, लाला लाजपतराय पर पुलिस द्वारा भांजी गई लाठियों की आवाज को महसूस किया था जिनके कारण उनकी मौत हो गई थी। उसका प्रतिशोध 17 दिसंबर, 1928 को लाहौर पुलिस स्टेशन में असिस्टेंट पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स की हत्या करके लिया गया।

पुलिस के लाख खाक छानने के बाद भी वह भगत सिंह तक नहीं पहुंच पाई और न ही उस पिस्तौल को बरामद कर पाई जिससे जॉन सांडर्स की हत्या की गई थी। तदुपरांत 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और उसके साथी बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका और उसी पिस्तौल के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।

वह पिस्तौल भगत सिंह के मुकदमे के दौरान आखिरी बार देखा गया जब ब्रिटिश जज ने सीआईडी के डीएसपी नियाज अहमद को पुलिस ट्रेनिंग अकादमी फिल्लौर भेजने के आदेश देते हुए उनके सुपुर्द किया गया। उसके बाद यह पिस्तौल कहां रही उसकी कोई जानकारी नहीं थी। इसकी खोज का आगाज 2016 में ‘द ट्रिब्यून’ में छपे न्यूज आइटम ‘लाहौर केस से जुड़ी चीजें कहां हैं’ के प्रकाशन से होता है। 86 बरस बाद जुपिंदरजीत सिंह इस पिस्तौल की पड़ताल हेतु पुलिस अकादमी फिल्लौर पहुंचते हैं और पाते हैं कि वहां पिस्तौल पहुंची ही नहीं! तो कहां है वह ऐतिहासिक पिस्तौल जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी! इसकी खोज का रोमांचित करने वाला विवरण लेखक द्वारा पुस्तक में दिया गया है। भगत सिंह की बगावत, पिस्तौल और बम धमाका, पिस्तौल के साथ गिरफ्तारी, पिस्तौल की फॉरेंसिक जांच, पुष्टि के लिए लंदन से एक विशेषज्ञ की आमद और उसके बयान का हवाला पुस्तक में है।

पुलिस अकादमी फिल्लौर के दस्तावेजों को खंगालते हुए ज्ञात होता है कि 7 अक्तूबर, 1969 को .32 बोरवाली यूएस मेक, बॉडी नंबर 168896 पिस्तौल स्कूल ऑफ वेपन एंड टैक्टिक्स बीएसएफ केंद्र इंदौर को भेज दी गई। अंतत: लेखक इंदौर में इस पिस्तौल को खोज ही लेते हैं। 86 वर्ष बाद यह पिस्तौल एक राज्य से दूसरे राज्य, एक फाइल से दूसरी फाइल तक होती हुई फिलहाल बीएसएफ की बॉर्डर आउटपोस्ट हुसैनीवाला में आ पहुंची जहां इसके चलाने वाले यानी शहीदे आजम भगत सिंह और साथियों का अंतिम संस्कार किया गया। यह पुस्तक दिलचस्प ऐतिहासिक दस्तावेज है।

पुस्तक : भगत सिंह की पिस्तौल की खोज लेखक : जुपिंदरजीत सिंह अनुवाद : शायदा बानो प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 174 मूल्य : रु.300.

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