पुस्तक समीक्षा

सागर तक गागर की यात्रा

सागर तक गागर की यात्रा

सत्यवीर नाहड़िया

बाल-साहित्य में बाल-मनोविज्ञान के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सन‍् 1957 में स्थापित राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के प्रकाशन की प्राथमिकताओं में रोचक बाल-साहित्य के मूल तत्वों को शामिल किया गया है। न्यास द्वारा प्रकाशित कहानी ‘गागर में सागर’ में यह पहलू प्रमुखता से उभर कर सामने आता है। जाने-माने बाल-साहित्यकार गोविंद शर्मा इस कहानी में गागर का मानवीकरण किया गया है, जिसके चलते गागर की सागर में यात्रा बेहद सजीव हो उठी है।

एक नदी में तेज बहाव से तांबे की गागर का हाथ से छूटकर सागर में चले जाना, वहां की अनूठी यात्रा के दौरान मछलियों के साथ खेलना, चिड़िया तथा उसके अंडों को आश्रय देना, तूफान आने पर पुन: दूसरे किनारे की ओर चले जाना, पेड़ में फंस जाना, बच्चों द्वारा निकालना तथा गागर का फिर से घर में प्रवेश की यात्रा का अनूठापन इसके शब्दों तथा अबीरा बंदोपाध्याय के रंगीन जीवंत चित्रांकन से बोल उठता है। गागर द्वारा मछली, चिड़िया तथा जल की रक्षा करने के संदेश के अलावा कहानी का अंतिम वाक्य दिल छू लेता है—’सबका भला करने वाला खुश तो रहता ही है।’ कलात्मक आवरण, नया आकार तथा रंगीन बड़े चित्र पुस्तक की अन्य विशेषताएं हैं, किंतु पृष्ठ संख्या का नदारद होना अखरता है।

यह कहानी बच्चों को अपनी कल्पनाशीलता से सागर की अनूठी यात्रा करवाते हुए मानवीय संस्कारों का संरक्षण एवं संवर्धन तथा बाल साहित्य को समृद्ध करेगी, ऐसी आशा है।

पुस्तक : गागर में सागर रचनाकार : गोविंद शर्मा प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नयी दिल्ली पृष्ठ : 17 मूल्य : रु. 35.

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