पुस्तक समीक्षा

बाल मनोविज्ञान की कसौटी

बाल मनोविज्ञान की कसौटी

घमंडीलाल अग्रवाल

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होने वाली रचनाकार उषा सोमानी का नवीनतम बाल कहानी-संग्रह है ‘जादुई बगीचा’, जिसमें उनकी लिखी 23 बाल-कहानियां मौजूद हैं। इनमें मनोरंजन व शिक्षा का भी अद‍्भुत पुट है। बाल मनोविज्ञान के धरातल पर भी ये कहानियां खरी उतरती हैं।

‘गुम हुई जुगनुओं की चमक’, ‘जादुई बगीचा’, ‘पेड़ों का रसोईघर’ तथा ‘फूल फिर से मुस्कराने लगे’ नामक कहानियां पर्यावरण संरक्षण पर आधारित हैं। मित्रता का भाव दर्शाती हुई कहानियों में ‘गिरगिट ऐसे जीत गया’, ‘बदलाव’, ‘दोहरी फसल’ तथा ‘मित्र की पहचान’ उल्लेखनीय हैं।

‘फड़-फड़भूत’ जीव-प्रेम, ‘ओल्ड इज गोल्ड’ पुरानी चीज़ों की अहमियत, ‘जहां चाह वहां राह’ पर्यटन-स्थलों के रख-रखाव, ‘खिल गए रंग’ जरूरतमंदों की सहायता, हौसले की ‘उड़ान’ विपत्ति के समय आत्मविश्वास व हौसला बनाए रखने पर बल देती हैं। ‘नारियल की गवाही’ में चोरी करने को बुरी बात कहा गया है तो ‘सूझ-बूझ ने बचाई जान’ कहानी का संदेश है कि मुसीबत में समझदारी से काम लेना चाहिए। ‘कुदरत का करिश्मा’ मनोरंजन प्रधान कहानी है।

‘देखकर जी ललचाए’ में जानवरों की चुहलबाजी है तो ‘लौट के घर आई राजकुमारी’ जैसी करनी वैसी भरनी का संदेश देती है। ‘जलपरी से मुलाकात’ में समुद्र का रोचक संसार निहित है और ‘महंगी पड़ी शरारत’ शरारत से बचने की बात कहती है! ‘मिस मुर्गी की दुकान’ में मज़ाक की सीमा तय करने की ओर संकेत है। ‘गधे का सपना’ में औरों का उपहास न करने के निर्देश हैं तो ‘डॉ. राधाकृष्णन’ शिक्षक-सम्मान को रेखांकित करती है।

पुस्तक : जादुई बगीचा लेखक : उषा सोमानी प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर पृष्ठ : 120 मूल्य : रु. 200.

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