जिंदा होने का मुखर अहसास

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जिंदा होने का मुखर अहसास

अरुण नैथानी

लघुकथा सृजन व संपादन में विशिष्ट पहचान रखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार अशोक जैन की संवेदनशील दृष्टि से सृजित लघुकथा संग्रह ‘जिंदा मैं’ को पाठकों का सार्थक प्रतिसाद मिला है। आम आदमी के सरोकारों पर केंद्रित लघुकथाएं व्यवस्था पर गहरी चोट करती हैं। राजनीतिक व सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब करती हैं। समाज में मूल्यों के क्षरण व संवेदनहीनता के कई जीवंत चित्र उकेरती हैं ये रचनाएं। इन चालीस रचनाओं के केंद्र में युवामन का आक्रोश, गिरगिटी रंग बदलती राजनीति, जीवन के पाखंड व आम आदमी की विवशता तथा विसंगतियों से जुड़े विषय हैं। लघुकथाएं पाठकों के अंतर्मन को झकझोरती हैं।

पुस्तक : ज़िंदा मैं रचनाकार : अशोक जैन प्रकाशक : अमोघ प्रकाशन, गुड़गांव पृष्ठ : 72 मूल्य : रु. 80.

कविता का जिंदगी होना

अलका कांसरा के काव्य संकलन ‘जिंदगी कविता हो गई’ से गुजरते हुए जहां जीवन के गहरे अहसास, जीवन की विसंगतियां, निजता की सीमाएं तथा सपनों का बोध दृष्टिगोचर होता है, वहीं आशा के दीप प्रज्वलित होते भी नजर आते हैं। संकलन में शामिल 71 कविताओं में जीवन भरपूर नजर आता है। सरल-सहज शब्दों में लिखी गई कविताएं पाठकों से सीधा संवाद करती हैं। विज्ञान की प्राध्यापिका रहते हुए भी कवयित्री ने एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में मानवीकीय विषयों पर भी गहरी पकड़ दिखायी है। रचनाओं में जहां आस्था के शब्द हैं, वहीं जीवन की क्षणभंगुरता का बोध भी है।

पुस्तक : जिंदगी कविता हो गई रचनाकार : अलका कांसरा प्रकाशक : सतलुज प्रकाशन, पंचकूला पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 250.

बंगभूमि की आभा

लेखिका माधवी मुखर्जी की पुस्तक ‘बंगभूमि का वैभव’ में गौरवशाली अतीत वाले इस प्रांत के इतिहास, संस्कृति, शिक्षा व भाषायी अस्मिता से शेष भारत के पाठकों को रूबरू कराने का सार्थक प्रयास किया है। लेखिका ने गहन अनुभूतियों से अतीत के प्रसंगों को समृद्ध किया है। वे बंगाल के परिवेश से गहरे तक जुड़ी रही हैं। पांच अध्यायों में विभाजित पुस्तक में बंगाल का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान, जाति प्रथा तथा स्त्रियों की दशा, शिक्षा एवं साहित्य, कला और जीवन तथा भाषा वैभव से जुड़े विषयों का विशद् विवरण दिया गया है। पुस्तक पठनीय है।

पुस्तक : बंगभूमि का वैभव रचनाकार: माधवी मुखर्जी प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर पृष्ठ : 78 मूल्य : रु. 200.

छात्र जीवन संवारने के गुर

उच्च शिक्षित और पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. हेमराज वोहरा ने लंबे अध्यापन के अनुभव के दौरान छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिये जरूरी जिन गुणों की जरूरत महसूस की, उन्हीं के लिये मार्गदर्शक लेखों को पुस्तक ‘छात्र विकास एवं व्यक्तित्व’ में समाहित किया है। दरअसल, शिक्षा के रोजगारपरक होने के कारण तमाम छात्र जीवन के वे जरूरी मूल्य हाशिये पर चले गये, जिनकी सभ्य समाज को सख्त जरूरत है। बालकों के विकास, व्यक्तित्व निखार व उन्हें एक अच्छा इंसान बनाने के लिये जरूरी गुणों का उल्लेख पुस्तक में किया है, जो उनका जीवन आदर्श बनाने में सहायक होंगे।

पुस्तक : छात्र विकास एवं व्यक्तित्व लेखक : डॉ. हेमराज वोहरा प्रकाशक : सप्तऋषि पब्लिकेशंस, चंडीगढ़ पृष्ठ: 160 मूल्य : रु. 250.

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