ये फुटबॉल का बुखार है... : The Dainik Tribune

कवर स्टोरी

ये फुटबॉल का बुखार है...

ये फुटबॉल का बुखार है...

रत्ना श्रीवास्तव

कोलकाता की सड़कें फुटबॉल खिलाड़ियों की पेंटिंग और फुटबॉल टीमों के झंडों से पट गई हैं। जगह-जगह चैंपियन फुटबॉलर्स के कटआउट हैं। केरल में दीवानगी इतनी ज्यादा है कि सड़कों पर ही नहीं, नदियों में और बिजली के तारों में फुटबॉल सितारों की तस्वीरें और झंडे लगा दिए गए हैं। केरल के मंत्री को इन फुटबाल फैंस को चेतावनी देनी पड़ी कि ऐसा बिल्कुल नहीं करें। केरल में कठमुल्ला इसलिए नाराज हो गए हैं कि उनके मजहब के लोग आखिर क्यों फुटबॉल सितारों को हीरो बनाकर उनकी पूजा कर रहे हैं। बांग्लादेश में लुंगियों की नई रेंज रिलीज हुई है, उसमें फुटबाल के चैंपियन देशों के झंडे से लेकर खिलाड़ियों तक की पिक्चर्स नीचे की ओर बनाई गई हैं। उन्हें पहनना शान समझा जा रहा है। पाकिस्तान में भी यही हाल है, नेपाल और भूटान में भी। अरब देश पहले से फुटबाल के बुखार से तप रहे हैं। यूरोप और लातीनी अमेरिकी देश तो इन दिनों फुटबॉल को ओढ़ते और बिछाते हैं। दुनियाभर की जेलों में इन दिनों कैदी टीवी पर केवल फुटबॉल का आनंद लेते हैं। ब्राजील में इन दिनों अगर लोग सड़कों और चौराहों पर इकट्ठा होकर फुटबाल की चर्चा करते हैं और अपनी टीम को वाहवाही देते हैं तो कई देशों में फुटबॉलर्स के पोस्टर्स और टीम के झंडों के साथ रैलियां निकली हैं। दूर क्यों जाते हैं अपने ही देश में दार्जिलिंग में वर्ल्ड कप का इस्तकबाल इसी तरह हुआ है।

फीफा वर्ल्ड कप फुटबॉल ओलंपिक के बाद दुनिया का सबसे बड़ा खेल मेला है। ये 29 दिनों तक चलेगा। और इन दिनों दुनिया में बहुत कुछ बदल जाता है। भावनाओं का सैलाब हिलोरें लेता है। तमाम देशों में जीवन की रफ्तार बदल जाती है। दफ्तरों की तस्वीर बदल जाती है। लोगों का व्यवहार बदल जाता है। जुनून का एक नया रंग चढ़ने लगता है...ये गहरा होता है... फिर और गहरा। 90 मिनट का हर मुकाबला एक भरपूर जिंदगी की तरह होता है। यानी 20 नवंबर से लेकर 18 दिसंबर तक रोज अनलिमिटेड रोमांच।

वर्ल्ड कप के मायने सबके लिए अलग हैं। दक्षिण अमेरिकी देशों के लिए तो ये जिंदगी है। कुछ की नजर में लोकतंत्र की बेहतरीन मिसाल। कुछ दशकों पहले फुटबॉल ने कई देशों में औपनिवेशिक युग के खिलाफ भी माहौल बनाया था। लातीनी देशों की गरीब बस्तियों और अफ्रीकी महादेश की भुखमरी और बेबसी में फुटबाल सपना है-उस दुनिया की ओर जाने का, जो बहुत रंगीन है, बहुत हसीन है। यूरोपीय देशों के लिए फुटबाल खालिस बिजनेस है-जहां लोग करोड़ों लगाते हैं और अरबों कमाते हैं, यहीं पूरी दुनिया की सबसे बड़ी फुटबाल लीग्स खेली जाती हैं, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी और खनकती फुटबाल मंडी कहा जाता है। जो बात फुटबाल में है, वो तो किसी और में नहीं। कहते हैं कि असल में केवल यही एक ऐसा अकेला खेल है, जिसके रिश्ते हमारे लहू से रहे हैं।

लातिनी देशों में तो इसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यूरोपीय देशों में ये पागलपन की हद तक उन्माद की लहरें फैलाता है। ज्यादातर लोगों की नजर में ये भगवान का खेल है, बिल्कुल नैसर्गिक खेल, जिसे हमने शायद सभ्यताओं से भी पहले खेलना शुरू कर दिया था, ये खेल हमारी प्रवृत्तियों में सदियों से शामिल रहा है। हालांकि कहा जाता है कि ये खेल चीन से निकला। माना जाता है कि फुटबाल का जन्म दूसरी सदी में चीन के हान साम्राज्य के दिनों में हुआ। यहां से ये पहले एशिया में फैली। फिर अमेरिका और लातिन अमेरिका गई। यूरोप में तो ये बहुत बाद में 12वीं सदी के आसपास पहुंची। इंग्लैंड में ये पहले खेली गई। हालांकि वहां राजाओं ने कई बार इस पर प्रतिबंध भी लगाया। 1871 में इंग्लैंड में नियमों के साथ पहली बार कोई प्रतियोगिता आयोजित हुई। इंग्लैंड से फुटबॉल पूरे यूरोप में फैली। ऐसी फैली कि हरदिल अजीज बन गई।

बेशक इसे नियमों के दायरे में कोई 100-200 सालों पहले बांधा गया। ये ऐसा खेल है, जिसे कोई नहीं भी जानता हो तब भी कुछ देर देखने के बाद तन-मन से इससे जुड़ा महसूस करने लगता है। मनोचिकित्सकों की बात करें तो वो कहेंगे कि इस खेल को लेकर पागलपन की हद तक दीवानगी इसलिए है क्योंकि ये बहुत सहज है... सारे तनावों को दूर करने वाला। इससे जुड़ते ही आप भी खुद को मैदान पर गेंद और गोल के बीच कड़ी की तरह महसूस करने लगेंगे।

हर वर्ल्ड कप से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भावनाओं का सैलाब अलग तरह से हिलोरें लेता है। पिछले दो- तीन वर्ल्ड कप तो ऐसे समय हुए कि बांग्लादेश में छात्रों ने इसे देखने के लिए परीक्षाएं ही टलवा दीं। इसी छोटे से देश में हर वर्ल्ड कप के दौरान बिजलीघर सबसे ज्यादा लोगों के गुस्से का निशाना बनते हैं, क्योंकि लोग मैचों के दौरान बिजली आपूर्ति में जरा सा भी व्यवधान बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसी देश की कई जेलों में कैदियों ने इसलिए हड़ताल कर दी क्योंकि उनकी बैरकों में मैच देखने के लिए टेलीविजन की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। यही नहीं कुछ साल पहले विश्व कप की किसी घटना से बांग्लादेश की संसद इतनी व्यथित हुई कि उसके विरोध में बहुमत से निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया। अब इसे क्या कहियेगा- फुटबाल को लेकर जुनून ही न।

हर वर्ल्ड कप के दौरान चीन जैसे कड़े प्रशासन वाले देश में देर रात तक घरों से गोल-गोल की तेज आवाजें आती हैं। वैसे ये आवाजें दुनिया के आधे उन देशों में इस बार भी आएंगी, जहां ये मैच देर रात नजर आएंगे। थाईलैंड का फुटबाल से कोई लेना-देना नहीं, पर वर्ल्ड कप के दौरान यहां सट्टेबाजी के जितने रिकॉर्ड टूटते हैं, उतने कहीं और नहीं। जब फुटबाल की दीवानगी का आलम इन देशों में इस कदर है, जहां की टीमें वर्ल्ड कप में नहीं खेल रहीं तो अंदाजा लगा सकते हैं कि जिन देशों की टीमें यहां उतरती हैं, वहां लोगों के खून का बहाव मैचों में कैसा होता होगा। हर मैच के 90 मिनट के दौरान यहां सांसें रुकी होती हैं, दिल की धड़कनें बेकाबू। कभी चेहरे पर खुशी के रंग बिखरते हैं तो कभी हताशा पूरे वजूद को घेर लेती है। लातीनी देशों, यूरोप और अफ्रीका में इन दिनों की जिंदगी का अहसास किया जा सकता है। अर्जेंटीना की टीम जब पहला मैच हारी तो देशभर में मुर्दानगी फैल गई। दूसरे मैच में जीत के बाद उनकी जान में जान आई।

कारोबार भी

वर्ल्ड कप खेल के साथ कारोबार भी है। इस फीफा वर्ल्ड कप से बेशक मेजबान कतर को जबरदस्त घाटा हो लेकिन फीफा की पांचों अंगुलियां घी में रहेंगी। कतर ने इस पर कुल मिलाकर 300 बिलियन डालर खर्च किए हैं। लेकिन बमुश्किल 17 बिलियन डॉलर ही वापस लौटेंगे। हां मैट्रो और होटलों या अन्य बिल्डिंग्स को बनाने से कुछ रकम लंबी अवधि तक मिलती रहेगी। फीफा को इस वर्ल्ड कप से करीब 7.5 बिलियन डॉलर की कमाई स्पांसरशिप, टिकट मनी, ब्रॉडकास्टिंग राइट्स के जरिए होगी। जिसमें 400 मिलियन डॉलर वो वर्ल्ड कप में शिरकत करने वाले देशों और विजेताओं में बांटेगा। ये रूस ही था जिसने चार साल वर्ल्ड कप से कमाई की थी, वो घाटे में नहीं था, अन्यथा बाकी देश घाटे से उबर नहीं पाते। वैसे इस वर्ल्ड कप में 8 नए स्टेडियम बने और इन सभी ने स्टेडियम आर्किटैक्ट की दुनिया में नई क्रांति ला दी। एक स्टेडियम तो 974 कंटेनर के जरिये बना और टूर्नामेंट के बाद इसके साथ कंटेनर और ढांचा निकालकर उरूग्वे पहुंचा दिया जाएगा, जहां अगला वर्ल्ड कप होगा। हो सकता है कि भविष्य में इस तरह के अस्थायी स्टेडियम कारगर हों। वैसे कतर ने टैंट का भी एक बड़ा स्टेडियम बनवाया। आनंद लीजिए वर्ल्ड कप का, इसके रंग में नहाइए। जुनून को महसूस करिए और ये भी जानिए कि ये विवादों से अछूता नहीं रहता। लिहाजा कतर अलग नहीं है। वहां पहले भी वर्ल्ड कप बनाने वाले मजदूरों के मरने पर खूब विवाद हुए। मानवाधिकार पर सवाल खड़े हुए। वर्ल्ड कप खत्म होते-होते यह सवाल जरूर उठेगा कि कतर जैसे कठमुल्ला कल्चर वाले देशों में क्यों ऐसे टूर्नामेंट होने चाहिए।

गुस्से का ग्राफ

अभी कुछ दिनों पहले महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रिपोर्ट दुनियाभर में जारी हुई। उसमें ये बताया गया कि किस देश में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा और दूसरी हिंसा का क्या हाल है। हैरानी की बात ये है कि जेंटल माने जाने वाले यूरोपीय देश भी इस लिस्ट में हैं। यूरोप में तो इस समय पति लोग टीवी पर फुटबॉल मैच छोड़कर हिलते ही नहीं। अगर पत्नियों ने कुछ कह दिया तो गुस्सा उनके खिलाफ उतरने लगता है। गलत है, दुखद है लेकिन है ऐसा ही। जर्मनी में एक महिला संगठन ने तो पतियों को मैच देखने के दौरान मिनरल वॉटर पीने की सलाह दे डाली ताकि वो कूल रहें, गुस्सा कम आए।

इस्राइल में तस्वीर बदली रहती है। हिंसक पतियों के हाथों होने वाली मारपीट की घटनाएं 50 फीसदी कम हो जाती हैं। केन्या में पत्नियां तब चकित रहने लगीं जबकि रात में देर से आने वाले पति एकदम सही समय पर घर आने लगे। व्यवहार बदल गया। बस वो चुपचाप टीवी पर फुटबाल के मैचों में मुंह घुसा लेते। एक पत्नी ने फरमाया-हे ईश्वर मेरी प्रार्थना है कि विश्व कप सालभर चला करे।

आमतौर पर स्त्रियां फुटबाल की दीवानी होती नहीं लेकिन ब्राजील और लातीनी देश अपवाद हैं। मैचों के दौरान वो खुलेआम आनंद का इजहार करती हैं। ब्राजील में महिलाएं ड्रमों की थाप पर सांबा डांस करती हैं। ब्राजील में हजारों जोड़ी पांव मैचों में जीत पर एकसाथ थिरकते हैं। लगता है कि पूरे देश में उत्सव हो रहा है। पूरा देश पीले और हरे रंग में सराबोर हो जाता है, ये ब्राजील के राष्ट्रीय झंडे का रंग है। हर कहीं फुटबॉल का बुखार! वैसे यूरोप को छोड़कर पूरी दुनिया के फुटबाल प्रेमी मना रहे हैं कि इस बार फुटबॉल का वर्ल्ड कप यूरोप ना जाए बल्कि उसको लातीनी देशों की ओर जाना चाहिए। वैसे एशियाई देशों को भी इस करिश्मे का इंतजार है कि शायद ये कप उनका हो जाए।

कृत्रिम द्वीप पर फैंस गांव, क्रूज भी

वैसे इस बार वर्ल्ड कप कतर में हो रहा है यानि एक अरब और एक मुस्लिम देश में तो वहां तमाम पाबंदियां भी हैं, जो कपड़ों से लेकर स्टेडियम में दर्शकों के व्यवहार और बीयर या अल्कोहल पर पाबंदी से भी जुड़ा है। नियम कड़े हैं। इसके बाद वहां दुनियाभर से 1.20 लाख दर्शक पहुंच गए हैं। ये कहीं जश्न मनाते हैं तो कहीं बवाल भी कर देते हैं। कतर बहुत छोटा देश है, यहां इतने दर्शकों के लिए शायद इंतजाम भी नहीं। लिहाजा एक कृत्रिम द्वीप बनाकर वहां फैंस विलेज बना दिया है। ये टैंट में बनी रिहायशी बस्ती है। हालांकि इसकी सुविधाओं को लेकर शिकायतें भी बहुत हैं। कतर में दर्शकों को ठहरा नहीं पाने की बेबसी के चलते यूरोप से तीन ऐसे बड़े क्रूज भी आकर दोहा के ग्रैंड क्रूज टर्मिनल पर खड़े हैं, जहां रोज शैंपेन की नदियां बहती हैं। ये किसी छोटे शहर की तरह हैं। लग्जरी से युक्त। कई फुटबॉल की टीमों के खिलाड़ियों ने तो अपनी माशूकाओं और बीवियों को यहीं ठहराया है।

लहर उठती है दर्शकों की

अब बात करते हैं इस वर्ल्ड कप में क्या कोई अरब कल्चर की लहर भी स्टेडियम में नजर आती है। बिल्कुल नजर आती है। अरब देशों में कोने-कोने से फुटबाल दीवाने यहां आए हैं। अरब से तीन टीमें इसमें शिरकत कर रही हैं - मेजबान कतर, संयुक्त अरब अमीरात , मोरक्को और ट्यूनीशिया। फिर ईरान की टीम भी तो एशिया की है, उनके पड़ोस की। वैसे एशिया की इन चार अरब देशों को मिलाकर 7 टीमें इसमें खेलीं-दक्षिण कोरिया और जापान भी। वैसे आस्ट्रेलिया को भी इस बार एशिया ग्रुप में डाल दिया गया। अरब देशों के लोग जब मैच देखते हैं तो वो अपने साथ ड्रप, मुंह से बजाने वाले यंत्र लेकर आते हैं, खूब हल्ला करते हैं। गाने गाते हैं। हालांकि वो अनुशासित रहते हैं। वैसे इस वर्ल्ड कप में सुरक्षा की जिम्मेदारी पाकिस्तान से भेजे गए 4500 सैनिकों ने निभाई है। ब्राजील में इन दिनों तमाम आफिसों और कारखानों में आधे दिन की छुट्टी हो गई है, खासकर उस दिन जिस दिन ब्राजील का मैच हो। लातीनी देशों में ये खेल जीवन के साथ इस तरह गुंथा है कि लोग इसके बगैर जीने की कल्पना नहीं कर सकते। लातीनी देशों में अर्जेंटीना के दर्शक सबसे ज्यादा हुड़दंगी होते हैं। खूब शोर मचाते हैं। अति उत्साह में स्टेडियम में कागज और दूसरे सामान भी फेंकते हैं। जर्मनी, नाइजीरिया और अर्जेंटीना के दर्शक कई रंगों से चेहरा रंगते हैं और खूब नाचते हैं। स्पेन के दर्शक भी खूब होहल्ला करते हैं। ढोल और तंबूरा साथ लिये रहते हैं। दक्षिण कोरिया के रेड डेविल्स टीम के साथ पहुंचते हैं। उन्हें लाल सेना या रेड आर्मी भी कहा जाता है। एक जमाने में इंग्लैंड के दर्शक दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पाती माने जाते थे। वो जमकर उत्पात करते थे, दुकानें लूट लेते थे। कुछ ऐसा ही काम फ्रांस और हालैंड में भी होता था, जहां हार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती। गनीमत है कि इंग्लैंड के दर्शक काफी हद तक सुधर गये हैं। इटली के दर्शक बेहद शालीन होते हैं। आमतौर पर वो शांतिपूर्ण तरीके से मैच देखते हैं। इस बार क्रोएशिया की एक युवती इंवाका नॉल भी अपने लटकों झटकों के कारण काफी सनसनी बनीं। वैसे कतर का गर्म मौसम खिलाड़ियों और दर्शकों के लिए कुछ मुसीबत का सबब जरूर है। एशिया, अरब, अफ्रीकी देशों को तो इससे दिक्कत नहीं लेकिन यूरोप, अमेरिका और लातीनी देशों के खिलाड़ियों के लिए 30 डिग्री से ऊपर के तापमान पर खेलना आसान नहीं।

(लेखिका खेल विशेषज्ञ हैं।)

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

ओटीटी पर सेनानियों की कहानियां भी

ओटीटी पर सेनानियों की कहानियां भी

रुपहले पर्दे पर तनीषा की दस्तक

रुपहले पर्दे पर तनीषा की दस्तक

पंजाबी फिल्मों ने दी हुनर को रवानगी

पंजाबी फिल्मों ने दी हुनर को रवानगी

आस्था व प्रकृति के वैभव का पर्व

आस्था व प्रकृति के वैभव का पर्व

मुख्य समाचार