समझ-सहयोग से संभालें रिश्ते : The Dainik Tribune

सामाजिक संबंध

समझ-सहयोग से संभालें रिश्ते

समझ-सहयोग से संभालें रिश्ते

डॉ. मोनिका शर्मा

टॉक्सिटी से भरा कोई भी रिश्ता न केवल तकलीफदेह होता है बल्कि आपकी ऊर्जा भी सोखता है। साथ होकर भी अकेलापन और बेचैनी आपके हिस्से आती है। दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी या सहकर्मी ही नहीं, आपके अपनों से जुड़े टॉक्सिक रिश्तों को भी अच्छे से समझना जरूरी है। टॉक्सिक सम्बन्धों में समस्याएं समय रहते न सुलझाई जाएं तो अंजाम आपराधिक घटनाओं के रूप में भी सामने आ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि पहले टॉक्सिक रिश्तों को अच्छे से समझा जाए।

साथ-समझ का मामला

रिश्ते के निबाह की कोशिशें हों, आपका पक्ष समझने का मामला हो या घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाने की बात - जब किसी भी मोर्चे पर साथ न मिले तो इसे टॉक्सिक रिलेशन ही कहा जाएगा। प्यार, भरोसा, समझौते, सहयोग और सामंजस्य की पूरी जिम्मेदारी जब आप पर ही आ जाए तो उस रिश्ते को नए सिरे से समझना जरूरी हो जाता है। चाहे दोस्ती हो, प्रेम हो या कोई करीबी रिश्ता, एक तरफ़ा रिश्ते का कोई भविष्य नहीं होता। ऐसा जुड़ाव थकाऊ और उबाऊ हो जाता है। इतना ही नहीं, कई बार ऐसे संबंधों में शोषण की स्थितियां भी बन जाती हैं। भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक मोर्चे पर एक पक्ष दूसरे पक्ष से फायदा निकालने की जुगत में ही रहता है। इन हालात में आप अपना दायित्व निभाइये लेकिन रिश्ते को ढोने के लिए सब कुछ करने की मत सोचिए। हर मोर्चे पर अकेले मत जूझिए। स्वस्थ और सम्मानजनक रिश्ते में साथ और समझ की उम्मीद करना आपका भी हक़ है।

विश्वास की कमी

विश्वास के बिना रिश्ते नहीं चल सकते। जैसे-तैसे चलाए भी जाएं तो न तो इनकी कोई मंजिल होती है और ही सफ़र में सुकून। ऐसा कोई भी रिश्ता ख़त्म हो ही जाता है। कई बार बस औपचारिकता के चलते ऐसे बंधन निभाये जाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि निभाने भर के लिए किसी रिश्ते को निभाना मन-जीवन पर बोझ बन जाता है। खासकर भरोसे की बुनियाद के बिना तो रिश्ता खोखला हो ही जाता है। एक-दूजे पर यकीन न होना नाखुशी की सबसे बड़ी वजह बन जाती है। किसी भी रिश्ते में साथ होना एक टीम की तरह जिन्दगी की परेशानियों से लड़ना होता है। साथ का यही भाव किसी भी स्वस्थ रिश्ते की पहचान बनता है। वरना अनगिनत उलझनें आ घेरती हैं। इतना ही नहीं, आपसी विश्वास के बिना तो उलझनें भी नहीं सुलझतीं। परेशानी का हल निकालने के बजाय इस टॉक्सिटी के चलते बहस ज्यादा होने लगती है। जिसके चलते कई बार दर्दनाक घटनाएं हो जाती हैं तो कभी जानबूझकर अपराध को अंजाम दिया जाता है। समय रहते सजग हों।

अतिवादी बर्ताव

टॉक्सिक सोच वाले लोग या तो हद से ज्यादा पोजेसिव होते हैं या बेहद एग्रेसिव। सोच-समझ के संतुलन से दूर इनका व्यवहार अतिवादी हो जाता है। ऐसे लोग इंकार नहीं सुन सकते और अपनी हर बात के लिए स्वीकार्यता की उम्मीद रखते हैं। अपनी जरूरतों को हद से ज्यादा अहमियत देते हैं। औरों के जज्बाती जुड़ाव को भी शक की नज़र से देखते हैं। ऐसा अतिवादी व्यवहार कई दुश्वारियां खड़ी करता है। इनसे जुड़ा इंसान न सुरक्षित महसूस करता है और न ही उसे सम्मान मिलता है। जो आपके लिए घुटन और भावनात्मक टूटन की वजह बन सकता है। इसीलिए टॉक्सिक रिश्ते के घेरे में रहकर खुद को दुःख न पहुंचाएं। सतर्क होकर स्थितियों को समझें| संवेदनशीलता से हालात बदलने की कोशिश भी करें पर कोई उम्मीद ही न बचे तो ऐसे रिश्ते से बाहर निकल आएं।

पीड़ादायक अनुभव

टॉक्सिक रिश्तों में चालाकी, झूठ और अपना दबदबा बनाये रखने का खेल भी खूब होता है। किसी एक पक्ष द्वारा बंदिशों और बदमिजाजी का माहौल बना दिया जाता है। शब्दों की तहजीब खो जाती है। सम्मान की जगह हिंसक व्यवहार ले लेता है। फिजिकल और वर्बल अब्यूज दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। साथ ही टॉक्सिक सोच वाले लोग अच्छाइयों की जगह आपकी कमजोरियां ढूंढने लगते हैं। बहुत चालाकी से दोषारोपण का खेल खेलते हैं। हर बात में जजमेंटल हो जाते हैं। हर तरह से आपको कमतर साबित करने में जुटे रहते हैं। यकीनन, यह सब मन से रिश्ता निभा रहे जीवनसाथी, दोस्त या सहकर्मी के लिए काफी दर्दनाक होता है। इन हालात में खुद को और पीड़ा देने के बजाय रिश्ते की बेहतरी के लिए खुलकर संवाद करना जरूरी हो जाता है। अगर बातचीत से भी बात न बने तो ऐसे सम्बन्धों से बाहर निकलने की राह भी तलाशनी पड़ती है।

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