नैंसी पेलोसी की व्यूह रचना को समझिए

नैंसी पेलोसी की व्यूह रचना को समझिए

पुष्परंजन

ताइपे शहर से 180 किलोमीटर दूर हुआथान शहर में सु-फू-ये बेकरी, अंडे की ज़र्दी से स्टफ्ड ‘योक पेस्ट्री’ के लिए प्रसिद्ध है। दो अगस्त, मंगलवार की रात सु-फू-ये बेकरी ने बैनर लटकाकर घोषणा की, कि यदि अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी एक घंटे के वास्ते ताइवान में हैं, छह पीस योक पेस्ट्री ख़रीदिये, हमारी ओर से एक पेस्ट्री फ्री। नैंसी पेलोसी दो घंटे रुकीं, तो छह योक पेस्ट्री के साथ दो फ्री। घंटे के हिसाब से पेलोसी का रुकना, और बेकरी वाले से फ्री की पेस्ट्री, ताइवानी मीडिया के लिए सुर्खियों का सबब बन गया। ताइपे के सोंगशान एयरपोर्ट पर पेलोसी मंगलवार की रात 10:44 पर उतरीं। वे कुल 19 घंटे ताइवान में रहीं। सोचिए, बेकरी मालिक चियांग का क्या हाल हुआ होगा? छह योक पेस्ट्री के साथ 19 पेस्ट्री फ्री।

बुधवार शाम छह बजे पेलोसी दक्षिण कोरिया के लिए प्रस्थान कर गईं। दक्षिण कोरिया के बाद, यात्रा के अंतिम चरण में उन्हें जापान जाना है। पेलोसी, कांग्रेसनल डेलीगेशन के साथ ताइवान की पहली महिला राष्ट्रपति त्साई इंग वेन से मिलीं, उनका सम्मान हुआ। संसद के सभापति से उनका मिलना हुआ। अमेरिकन इंस्टीच्यूट गईं, ऐसी तमाम ख़बरें वहां के मीडिया में है। लेकिन जिस ख़बर को जानने के बाद अमेरिकी खेल समझ में आता है, वह है नैंसी पेलोसी का चिप इंडस्ट्री के दिग्गजों से मिलना।

ताइवान की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के वरिष्ठ सांसद ख़ेर छिएन मिंग ने एक मेल के ज़रिये जानकारी दी कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के चेयरमैन मार्क लियु, टीएसएमसी के संस्थापक मोरिस छांग, एपल आईफोन के असेंबलर ‘पेगाट्रोन’ के वाइस चेयरमैन जेसोन चेंग से नैंसी पेलोसी का संवाद हुआ। उन्हें कुछ दिन पहले पारित अमेरिकन चिप एंड साइंस एक्ट के हवाले से भरोसा दिया गया कि 52 अरब डॉलर हम ताइवान की उन सेमीकंडक्टर निर्माण करने वाली कंपनियों को देंगे, जो अमेरिका मंे रहकर चिप डेवलप करेंगी। एपल, गूगल, क्वालकम, एन-विडिया जैसी कंपनियों से सहकार की दिशा में आगे बढ़ेंगी। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) वर्ल्ड मार्केट कैपिटलाइजेशन के मामले में नौवें स्थान पर है। ‘मार्केट कैपिटलाइजेशन’ शेयरों की ख़रीद-बिक्री से घटता-बढ़ता है।

पेलोसी ने हिदायत दी है कि चीन से उन चिप कंपनियों का कोई नाता नहीं होना चाहिए। उसकी वजह, जियो पॉलिटिकल के साथ मिल्ट्री भी है। उदाहरण के लिए ताइवान की टीएसएमसी चिप्स है, जिसका इस्तेमाल अमेरिकी फाइटर जेट, ‘एफ-35’ में होने लगा है। टीएसएमसी चिप्स स्मार्टफोन, डाटा सेंटर और सुपरकंप्यूटर में पहले से लगाये जा रहे हैं। उसी तरह सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा है। डाटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में सेमीकंडक्टर का बहुत बड़ा रोल रहता है। इसे मान लेना चाहिए कि अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी वर्चस्व की लड़ाई तेज़ी से शुरू है, उसे साधने के वास्ते ताइवानी तकनीशियनों का इस्तेमाल, अमेरिकी सबसे ज़रूरी मानते हैं।

एक और प्रतिस्पर्धा इंटीग्रेटेड सर्किट को लेकर है जिसे चिप या माइक्रोचिप के रूप में भी जाना जाता है। साल 2021 तक इंटीग्रेटेड सर्किट मार्केट के 54 प्रतिशत हिस्से पर अमेरिकी कंपनियों का कब्ज़ा बताया गया था। दुनिया के माइक्रोचिप बाज़ार पर दक्षिण कोरिया की 22 प्रतिशत और ताइवान की 9 फीसद हिस्सेदारी है। नैंसी पेलोसी की ताइवान-दक्षिण कोरिया यात्रा का दूसरा मकसद एशियाई चिप इकोनॉमी पर आधिपत्य जमाना है। इस एंगल को समझने की ज़रूरत है, जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखता।

जो दिख रहा है, वो ये कि जी-7 के विदेश मंत्रियों ने नैंसी पेलोसी की यात्रा के दौरान चीन की भाषा और हरकतों पर आपत्ति जताई है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इस दौरान इस्टर्न थिएटर कमांड को जिस तरह सक्रिय किया, ताइवान के आसपास के द्वीपों से हवाई व समुद्री मिल्ट्री ड्रिल करवाई, ड्रोन एक्टिव किये, उसके हवाले से दुनिया के दीगर हिस्सों को लगा कि यूक्रेन के बाद दूसरा मोर्चा इस इलाके में खुल चुका है। ख़ुसूसन भारतीय विजुअल मीडिया इस मामले में बिल्कुल अगंभीर और अधीर दिख रहा था।

पेलोसी, ताइवान यात्रा के दौरान ‘डेमोक्रेसी, डिफेंस और फ्रीडम’ जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करती रहीं। अब कोई पेलोसी से पूछे, 25 अक्तूबर, 1971 को आरओसी (रिपब्लिक ऑफ चाइना, ताइवान प्रायद्वीप का नाम) को जब संयुक्त राष्ट्र से निष्कासित किया गया, तब अमेरिका कहां था? उसने 51 साल पहले वीटो का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? आज चाइनीज़ नेशनलिस्ट पार्टी (क्वोमितांग) सत्ता में नहीं है। सेंटर-लेफ्ट नेशनलिस्ट विचारधारा वाली डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) सन‍् 2000 से सत्ता में है। डीपीपी चीन से मुक्ति के लिए संघर्षरत है। तो संयुक्त राष्ट्र में ताइवान की वापसी के प्रयासों में अमेरिका मदद क्यों नहीं करता?

1992 में वन चाइना पॉलिसी की घोषणा हुई, उद्देश्य यही बताना था कि ताइवान, एकीकृत चीन के अधीन है। तिब्बत को भी ‘वन चाइना पॉलिसी’ के तहत माना गया। अमेरिकी पोजिशन उन दिनों यही थी कि ताइवानी नेता मिल-जुलकर शांतिपूर्ण समाधान निकालें। अब अमेरिका चूंकि चीन से आर्थिक युद्ध लड़ने का आकांक्षी है, तो ताइवान का कंधा उसे चाहिए। ताइवान में 84 फीसद हान आबादी है, जिन्हें मुख्यभूमि चीन से दूरगामी रणनीति के तहत बसाया गया था। हान चीनियों का तिब्बत से ताइवान तक व्यापार पर कब्ज़ा है। मगर, जब आरपार की लड़ाई छिड़ती है, इनका कारोबार भी प्रभावित होता है। जैसे, पेलोसी की यात्रा के तुरंत बाद चीन ने दो हज़ार ताइवानी प्रोडक्ट को मेनलैंड चाइना के बाज़ार से हटा दिया है। चीन ने अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स को तलब किया और प्रतिरोध पत्र पकड़ा दिया कि पेलोसी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ ताइपे जिस तरह पधारीं, वह वन चाइना पॉलिसी के विपरीत है, और ताइवान को उकसाने वाली कार्रवाई है।

कई बार लगता है कि चीन और नैंसी पेलोसी नूरा कुश्ती खेल रहे हैं। कम लोगों को पता है कि अमेरिकी डेमोक्रेट नेता नैंसी पेलोसी के ल्हासा जाने का इंतज़ाम नवंबर, 2015 के पहले हफ्ते में चीनी प्रशासन ने किया था। तब नैंसी पेलोसी ने ‘तिब्बत में सब चंगा सी’ बोलकर उन्हें तुष्ट कर दिया था। पेलोसी ने तिब्बत से लौटते ही बयान दिया कि वहां धार्मिक आज़ादी, जातीय संस्कृति, पारिस्थितिकी व पर्यावरण चीनी शासन की देखरेख में सुरक्षित हैं। मगर, डेढ़ साल बाद 9 मई, 2017 को जब नैंसी पेलोसी दलाई लामा से मिलने धर्मशाला पहुंच गईं, तो चीनियों के कान खड़े हुए। मतलब ये कि नैंसी पेलोसी शतरंज की कौन-सी चाल चलने वाली हैं, सुनिश्चित होकर नहीं कह सकते। सोचिए, नैंसी पेलोसी एक डेलीगेशन के साथ ल्हासा घूम आईं, चीन को ज़रा भी कष्ट नहीं हुआ। नैंसी ताइवान जाएं, तो तूफान खड़ा होता है। भारत में तो ऐसा गुब्बारा फुलाया गया, गोया यूक्रेन के बाद युद्ध का दूसरा फ्रंट एशिया में खुल गया हो!

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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