तिरछी नज़र

इत्र की महक और खजाने की चहक

इत्र की महक और खजाने की चहक

सहीराम

देखिए ऐसी गलती तो भगवान से भी हो जाती है। दुनिया में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं कि यमराजजी ने गलती से किसी और के प्राण हर लिए। ऊपर जाकर जब चित्रगुप्तजी खाता-बही का मिलान करते हैं तो गलती का पता चलता है, लेकिन तब तक उस व्यक्ति को दुनिया को सुनाने के लिए अच्छी-खासी कहानियां मिल जाती हैं कि यमलोक कैसा है। हालांकि, माना यही जाता है कि वहां से यह बताने के लिए कोई नहीं लौटता। ऐसी गलती शासकों से भी खूब होती है कि अपने वफादार के रूप में वे जिसकी पहचान करते हैं, अंत में वही उन्हें सूली पर टांग देता है। हमारे सुरक्षा बलों से तो ऐसी गलती अक्सर ही हो जाती है कि किसी गुंडे-बदमाश का एनकाउंटर करने की बजाय उनके हाथों से किसी निर्दोष का एनकाउंटर हो जाता है। ऐसे में अगर ऐसी ही गलती हमारी रेड मारने वाली एजेंसियों से हो जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। देखा नहीं, पिछले दिनों यूपी में हो गयी। रेड मारनी थी इस इत्र वाले के और रेड डाल दी किसी दूसरे इत्रवाले के यहां। कमाल यह हुआ कि इस गलती का फल रेड एजेंसियों को ढाई सौ करोड़ रुपये की रकम के रूप में मिला। जैसे राज संयोग से मिलते हैं, तख्त संयोग से मिलते हैं, वैसे ही खजाने भी संयोग से ही मिलते हैं। अलीबाबा का खुल जा सिमसिम इसका उदाहरण है। कहीं रेड एजेंसियों ने भी यही मंत्र तो नहीं बोला था।

बहरहाल, वैसे तो लोग कपड़ों से भी पहचान लेते हैं। नहीं-नहीं हम उस पहचान की बात नहीं कर रहे। यहां तो बात उन सज्जन की हो रही है जो हवाई चप्पलें पहनकर शादियों में पहुंच जाते थे। ऐसा तो अक्सर ही होता है कि ठग सूट-बूट में मिलता है, लेकिन करोड़पति- अरबपति कहां हवाई चप्पलों में मिलते हैं। हां, नेता जरूर मिल जाते हैं। शायद हवाई चप्पल पहनने वाले इन नेताओं से ही प्रधानमंत्रीजी इतने मुत्तासिर हुए होंगे कि उन्होंने एक वक्त तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि अब हवाई चप्पल पहनने वाले भी हवाई जहाज में यात्रा किया करेंगे। एयर इंडिया को बेच कर उन्होंने मुश्किल से इस वादे से अपना पिंड छुड़ाया। अगर यह ढाई सौ करोड़ वाला हवाई चप्पलधारी उन्हें पहले मिल जाता, तो वे अपना सपना पूरा कर सकते थे। हालांकि बताते हैं वह बंदा तो अपने पुराने स्कूटर से ही चलता था। खैर, यह झगड़ा इत्रवालों का नहीं था। यह झगड़ा तो राजनीतिक पार्टियों का था। हुआ यह कि एक इत्रवाले ने समाजवादी इत्र लांच कर दिया। हालांकि समाजवाद और इत्र दोनों विरोधाभासी है, पर विरोधाभास ही तो अब राजनीति का सच है। शासक पार्टी को यह पसंद नहीं आया और उसने रेड डलवा दी। और सरकार मालामाल हो गयी। क्या सच में?

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