तिरछी नज़र

रुपये का गिरना और उनका उठना

रुपये का गिरना और उनका उठना

ऋषभ कुमार जैन

रुपया गिर रहा है। सारा देश हैरान-परेशान है। विपक्ष वाले गिरावट को ऐतिहासिक बताने पर उतारू हैं। इन्होंने साठ से शुरू किया था और सत्तर पर ला दिया। ‘जीरो से साठ तक तो आप लाये थे’-इस पक्ष वाले जवाबी वार करने में भिड़े हैं। आजादी के बाद से गिरता ही गया रुपया। कहते हैं कभी-कभी सरकारें अपनी मुद्रा स्वयं ही गिराती हैं। इसे अवमूल्यन कहा जाता है। कुछ मुद्राएं अपने आप ही लुढ़कने में विश्वास रखती हैं। तब लोग गिर रहा- गिर रहा कहते हैं। यह सुनने में अच्छा नहीं लगता। बड़ा गिरापन महसूस होता है।

विपक्ष कहता है रुपया गिर रहा है। सरकार बताती है कि रुपया नहीं गिर रहा बल्कि डॉलर उठ रहा है। उठना-गिरना भी सापेक्ष हो गये। आइन्स्टीन होते तो ‘सापेक्षता का वित्तीय सिद्धांत’ लाते। कहते हैं कि उनके सापेक्षता के सिद्धांतों को गिनती भर लोग समझ पाये। रुपये-डॉलर की सापेक्षता को सही समझने वाला एक भी नहीं है।

एक और वैज्ञानिक हुए, ‘न्यूटन’। वे बता गये कि चीजें पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गिरती हैं। ऐसा लगता है यह शक्ति पूरी तत्परता से रुपये के पीछे लगी रहती है। सब नतमस्तक हैं। विज्ञान को कौन चुनौती दे। डॉलर पर गुरुत्वाकर्षण का नियम लागू नहीं है। अमेरिका तो अमेरिका उनकी मुद्रा तक उच्छृंखल है।

वैसे हमें वैज्ञानिक विश्लेषण के चक्कर में न पड़ते हुए सही उपाय तलाशना चाहिए। गिरावट तब से बढ़ी है, जबसे रुपये का चिन्ह बदला गया है। नोटों का डिजाइन बदलना भी एक कारण हो सकता है। हो सकता है इनमें कोई वास्तुदोष हो। एक-एक कर इन्हें बदल कर देखा जाना चाहिए। यदि इन उपायों से वांछित परिणाम न मिलें तो रुपये का नाम बदल कर ‘ड’ अक्षर से रखना उचित होगा, ताकि राशि समान होने से डॉलर जैसी योग्यता आ सके।

देशवासी इस बारे में क्या सोचते हैं यह जानने के उद्देश्य से मैंने मनरेगा के एक मजदूर से बात की।

‘रुपया गिर रहा है।’ मैंने कहा।

‘अच्छा? फिसल गया क्या? तभी दो माह से मजदूरी भुगतान नहीं हुआ।’

‘मतलब यह कि उसकी कीमत कम हो रही है। तुम्हें महीने के छह हजार मिलते हैं न, इसमें पहले सौ डॉलर आते थे, अब अस्सी ही आयेंगे।’ मैंने समझाया।

‘डॉलर-वालर किसे खरीदना है जी, आप तो चावल-दाल की कहो।’

मैंने हाथ जोड़ लिए। शायद यही है आज का अर्थशास्त्र। रुपया गिरता है, इससे महंगाई बढ़ती है, फलस्वरूप वेतन बढ़ते हैं, वेतन देने को सरकार और नोट छापती है, जिससे रुपया और गिरता है... सतत क्रम जारी रहता है। हम बड़े ही सज्जन लोग हैं साब। रुपये में 10 फीसदी गिरावट से हमें मतलब नहीं, हम तो जुलाई में तीन फीसदी इंक्रीमेंट पाकर खुश रहने वाले बंदे हैं।

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