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बुलंद इरादों से हासिल अपना आकाश

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अरुण नैथानी

अरुण नैथानी

जहां बेटियों में कुछ कर गुजरने का जुनून हो, मंजिलें उनके पास आ ही जाती हैं। सपने हकीकत बन ही जाते हैं। पिछले दिनों एयर इंडिया की सेन फ्रांसिस्को से बेंगलुरु तक की एक उड़ान सुर्खियों में रही। यह कोई सामान्य उड़ान नहीं थी, इस नॉन-स्टॉप उड़ान ने इतिहास रचा। सबसे महत्वपूर्ण बात कि कॉकपिट में सिर्फ बेटियां मोर्चा संभाले हुए थीं। दुनिया के सबसे लंबे रूट की इस यात्रा में ऐसा पहली बार हुआ कि महिला पायलटों ने उड़ान का संचालन किया हो। उससे महत्वपूर्ण बात यह कि उड़ान उत्तरी ध्रुव के ऊपर से होते हुए गुजरी, जहां एक समय 180 डिग्री का टर्न लेकर यात्रा में आगे बढ़ा जाता है। सफल उड़ान के कारण यह पहल दुनिया के इतिहास में दर्ज हो गई। टीम का नेतृत्व करने वाली जोया अग्रवाल आज सुर्खियों की सरताज है।

उत्तरी ध्रुव को पार कर बेंगलुरु पहुंचकर इतिहास रचने वाली टीम का देश में गर्मजोशी से स्वागत हुआ। पहली बार ऐसा हो रहा था कि महिला पायलट के नेतृत्व में महिला चालक दल वाली उड़ान उत्तरी ध्रुव के ऊपर से गुजर रही थी। पूरी टीम इस बात को लेकर खासी रोमांचित थी कि वे इस यात्रा से बनने वाले रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। उत्साहित एयर इंडिया यात्रा की पल-पल की खबर सोशल मीडिया के जरिये लोगों को दे रही थी। जहां उड़ान की शुरुआत समारोहपूर्वक हुई, वहीं देश में उतरने पर चालक दल का गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

निस्संदेह सही मायनो यह नारी शक्ति के सपनों की ऊंची उड़ान थी। विमान को उड़ाने वाला दल न केवल पेशेवर कौशल से परिपूर्ण अनुभवी था बल्कि आत्मविश्वास से भी भरा था। एयर इंडिया की  उड़ान संख्या एआई-176 की नॉन-स्टॉप फ्लाइट ने सत्रह घंटे में यह यात्रा पूरी की।  इस ऐतिहासिक उड़ान का नेतृत्व करने वाली जोया अग्रवाल की टीम में सहायक पायलट के रूप में कैप्टन थनमई पपागड़ी, कैप्टन आंकाक्षा सोनावड़े तथा कैप्टन शिवानी मन्हास भी शामिल थीं।

जोया बताती हैं कि दरअसल, इस ऊंची उड़ान का हमारा सपना काफी अर्से से हकीकत में बदलने की प्रतीक्षा में था जो पिछले साल खराब मौसम के कारण हकीकत न बन सका। अब जाकर दो सिलिकॉन वैलियों के बीच यह ऐतिहासिक उड़ान हकीकत बन पायी। जोया बताती हैं कि पहले भी लंबी उड़ान की यात्राएं होती थीं, कभी अटलांटिक महासागर के ऊपर से या फिर प्रशांत महासागर के ऊपर से, लेकिन उत्तरी ध्रुव के ऊपर से उड़ान भरना खास बात है। वे इस बात को अपनी खुशकिस्मती मानती हैं कि उन्हें उत्तरी ध्रुव ऊपर से देखने का मौका मिला, जिसके बारे में बहुत से लोग जानते तक नहीं हैं। मैं खुद को  भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे ऐसे ऐतिहासिक अभियान का नेतृत्व करने का अवसर मिला जो विमानन इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जैसा ही है। इस इतिहास का हिस्सा बनने के लिये आम लोगों में खासी उत्सुकता थी। यही वजह थी कि 238 यात्रियों वाले जहाज में सभी सीटें समय से पहले भर गई थीं। 

दरअसल, कैप्टन जोया अग्रवाल एयर इंडिया की वरिष्ठ पायलट हैं। उनके पास लगभग आठ हजार घंटे की उड़ान का अनुभव है। इसके अलावा बतौर कमांडर बोइंग-777 हवाई जहाज उड़ाने का उनके पास दस साल से अधिक और ढाई हजार घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव है।

जोया बताती हैं कि वह जब एयर इंडिया में पायलट बनीं तो घर-बाहर उन्हें सहजता से स्वीकार नहीं किया गया। यह पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र था। उन दिनों गिनी-चुनी महिला पायलट होती थी लेकिन छोटे होने के नाते पूरा सहयोग मिलता था। मन में यही संकल्प था कि कड़ी मेहनत करनी है। इस वजह से नहीं कि मैं महिला हूं बल्कि इस वजह से कि यह बहुत ही जवाबदेही का कार्य होता है।

अपने मां-बाप की इकलौती संतान जोया ने जब घर वालों को बताया था कि वह पायलट बनने जा रही है तो घर का वातावरण असहज हो गया था। मां तो भय से रो ही पड़ी थी।  कालांतर उन्होंने मेरी इच्छाओं सम्मान किया। वहीं वर्ष 2013 में वह जब बोइंग-777 की सबसे कम उम्र की कैप्टन बनी तो मां फिर रोई, लेकिन इस बार आंसू खुशी के थे।

जोया समेत पूरी टीम इस लक्ष्य को लेकर उत्साहित-रोमांचित थी कि वे एक विशिष्ट घटना का हिस्सा बनने जा रहे हैं। जोया खुद को भाग्यशाली मानती है कि वह विमानन के इतिहास में दर्ज होनी वाली उड़ान का हिस्सा बनी है जो दुनिया के दो विपरीत बिंदुओं को जोड़ने वाला सबसे तेज रूट है।

जोया कहती है कि लड़कियों को अपनी आकांक्षाओं के आकाश को विस्तार देना चाहिए। हर किसी को अपना सपना देखना चाहिए, लेकिन साथ ही उस सपने को हकीकत में बदलने के लिये सक्षम भी बनना चाहिए। फिर नामुमकिन भी मुमकिन बन सकता है। सामाजिक दबाव को दरकिनार करके  खुद पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ा जा सकता है। भारत में सबसे कम उम्र में बोइंग-777 को उड़ाने वाली जोया को उस समय भी सराहा गया था जब उन्होंने एक यात्री की जान बचाने के लिये दिल्ली हवाई अड्डे पर मध्य आकाश से आपातकालीन लैंडिंग कराई थी। साथ ही कोविड संकट में वंदे मातरम मिशन में भी उनके योगदान को सराहा गया। 

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