होली की नज़र

बाजनीति-खाजनीति और ताजनीति

बाजनीति-खाजनीति और ताजनीति

हरि जोशी

राजनीति के लिए आज सबसे उपयुक्त कोई पर्व है तो वह है होली। दिल मिले न मिले, गले लगते लगाते रहिये। एक दिन के लिए गले मिल लो, बाकी साल भर, गलाकाट गतिविधि में संलग्न रहो। साल भर उनके गले पड़ते रहो। जिसे पहले भरपूर गालियां सुनायी हों, होली के दिन उस पर थोड़ा रंग डाल दो। सामने वाले के व्यवहार का रंग बदल जायेगा। शत्रुता, थोड़ी मित्रता में तो बदलेगी? दुश्मनी और दोस्ती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक ओर होली सर्वाधिक रंगीली है तो दूसरी ओर राजनीति, गाल-गलौज, टांग खिंचाई और जूतम-पैजार से भरी पूरी होती है। राजनीति तो इस अत्यधिक सांस्कृतिक गतिविधि में आकंठ डूबी है। होली और राजनीति में यही साम्य है।

बरसाने को छोड़ दें तो डंडामार होली या बाड़मेर को छोड़ दें तो पत्थरमार होली अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती, किन्तु पत्थरमार या डंडामार राजनीति हमारे देश में हर कहीं देखी जा सकती है। वैसे तो पत्थरदिल इंसान भी होली खेलते-खेलते कोमल हृदय का हो जाता है किन्तु राजनीति में उतरकर कोमल दिल वाला मनुष्य भी पत्थर दिल हो जाता है। वस्तुतः राजनीति, कुछ कुछ बाजनीति होती है जो कमज़ोर होता है उसे दबोच लेती है। कई लोगों को इसकी खाज-खुजली हमेशा बनी रहती है, इसलिए इसे खाजनीति भी कहा जा सकता है। ताज पहनने की लालसा वाली ताजनीति भी कह देंगे तो चलेगा। होली में सुर प्रवृत्ति विजयी होती है तथा असुर प्रवृत्ति जल कर राख। राजनीति में असुर प्रवृत्ति वाले ही बहुधा शिखर छूते हैं।

पुरानी कहावत है होली नंगों की होती है, और राजनीति, क्या बड़े शालीन लोगों की? होली में जलाई जाने वाली बेकार की वस्तुएं जैसे टूटी खटिया, बिन पाये की कुर्सी, जंगली लकड़ी बहुधा चुराई जाती है, जबकि राजनीति में सत्तासीन लोग तरह-तरह के ऊंचे चौर्य कर्मों में लिप्त पाये जाते हैं। होली के आसपास कुछ दिनों का मौसम ही पानीदार रहता है, जबकि सत्ता प्राप्त राजनीतिज्ञों के चहुं ओर मौसम हमेशा ही पानीदार बना रहता है। आज की रंगीनियत का भी यही हाल है। होली की रंगीनियत कुछ दिनों की मेहमान होती है, जबकि राजनीति की, जाने का नाम ही नहीं लेती।

होली जलाने की कथा का सार यह है कि भक्त प्रहलाद को होलिका की गोद में बैठा दिया जाता है, अंत में होलिका का तो दहन हो जाता है, प्रहलाद बच जाते हैं। किन्तु राजनीति की गोद में जब भले लोग आकर बैठते हैं तो उनकी मनुष्यता और संवेदना ही नहीं, उनके समग्र व्यक्तित्व जलकर राख हो जाते हैं। अलबत्ता, राजनीति बची रहती है। होली में एक-दूसरे पर अबीर गुलाल और रंग फेंके जाते हैं, जबकि राजनीति में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, पत्थर और कुर्सियां।

1947 तक प्रत्येक बस्ती में एक एक होली ऐसी जलती थी, जिनमें विदेशी वस्त्र, विदेशी वस्तुएं जलाई जाती थी। आजकल प्रत्येक मोहल्ले में भैया साहब की पहली, ठाकुर साहब की दूसरी, और नेताजी की तीसरी होली जलती रहती है। यानी हर नेता की अलग-अलग हो ली। आज राजनीति इस तरह हावी है कि होली, भले ही होलीमय न रहे, राजनीति पूरी तरह अग्निकुंड लगती है।

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