स्मृति शेष

जीवंत रचना कर्म में मौजूदगी का अहसास

जीवंत रचना कर्म में मौजूदगी का अहसास

चित्रांकन : संदीप जोशी

अतुल सिन्हा

बेशक मन्नू भंडारी 90 साल की रही हों, कुछ समय से बीमार भी चल रही हों, लेकिन उनके भीतर हमेशा एक नई ऊर्जा से भरा रचनाकार बसता था। कुछ साल पहले एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि मेरी उम्र बेशक हो गई हो लेकिन मैं मन से ऐसा कभी महसूस नहीं करती। आज भी मेरे भीतर कुछ करने का जोश है, इच्छा है, आकांक्षा है। और बेशक उनकी यही इच्छा और आकांक्षा तमाम निजी तनावों और मुश्किलों के बावजूद उनके लेखन में पूरी जीवंतता के साथ मौजूद है।

किसी लेखक की रचनादृष्टि पर चर्चा करते हुए अक्सर हम उसके आसपास की परिस्थितियों, देश, काल और समाज को देखने की उसकी सूक्ष्मता के साथ-साथ उसकी भाषा और शैली के आधार पर उसका विश्लेषण करते हैं। मन्नू भंडारी की रचनाओं में इन तमाम पहलुओं को बेहद बारीकी से महसूस किया जा सकता है। जिस दौर में उन्होंने ‘आपका बंटी’ जैसा उपन्यास लिखा, उस वक्त स्त्री विमर्श (जिसे तब स्त्री जागरण कहा जाता था) को लेकर इतना शोर शराबा नहीं था। वो 70 के दशक का शुरुआती दौर था और ये उपन्यास उससे पहले ही आकार लेने लगा था। मन्नू जी ने तभी एक बच्चे के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष को पकड़ा था जो वह अपने माता- पिता के निजी रिश्तों में अलगाव और दरार के कई आयामों को देखते हुए महसूस करता है। रिश्तों के इस जटिल ताने बाने के बीच एक बच्चे के अकेलेपन और बाल मन पर होने वाले असर को मन्नू जी ने जिस संवेदनशील तरीके से पेश किया, वह अद्भुत है। यह उपन्यास बेशक बच्चे के मनोविज्ञान को पकड़ने के लिए जाना जाता है लेकिन इसमें स्त्री चेतना और उसके आत्मसम्मान की एक झलक भी है और पुरुषवादी सामंती चरित्र का विद्रूप चेहरा भी। जाहिर है ‘आपका बंटी’ मन्नू भंडारी की पहचान बन गया।

दरअसल राजेन्द्र यादव के साथ शादी के कुछ समय बाद से ही मन्नू जी भंडारी को ये महसूस होने लगा कि तमाम घरेलू कामकाज और ज़िम्मेदारियों के बीच लिखना बेहद कठिन है। पति राजेन्द्र यादव के निजी जीवन की अराजकता को देखते-समझते और अपनी नन्ही बेटी रचना के अकेलेपन के अहसास को करीब से महसूस करते हुए मन्नू जी के भीतर का उपन्यासकार हमेशा लिखने को बेचैन रहता। ये मन्नू भंडारी ही बताती थीं कि आपका बंटी लिखने के लिए उन्होंने एक महीने के लिए घर छोड़ दिया। कॉलेज के हॉस्टल का एक कमरा लिया और 28 दिनों में यह उपन्यास पूरा किया। बेशक उस दौरान राजेन्द्र यादव ने उनकी हौसलाअफजाई की, उनके लिखने के जज्बे को बढ़ावा दिया, लेकिन मन्नू जी पर ज़िम्मेदारियों का बोझ कभी कम नहीं हुआ।

मन्नू भंडारी के निजी जीवन के तनाव और राजेन्द्र यादव से अलग होने के उनके फैसले को अगर दरकिनार कर दें तो उनके लेखन में कई शेड्स दिखते हैं। लेकिन उनके लेखन की जो मुख्य चिंता है, वह बेशक हमेशा से महिलाओं को समाज में मिलने वाला दोयम दर्जे का बर्ताव, उपेक्षा और अपमान के साथ उसे एक घरेलू कामकाज और भोग की वस्तु समझने वाला नजरिया रहा है। ऐसा नहीं है कि ये उन्होंने राजेन्द्र यादव से शादी करने के बाद महसूस किया और लिखने लगीं। वह पचास के दशक के शुरुआती दौर से ही लिखना शुरू कर चुकी थीं। पिता सुखसंपत राय भंडारी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सक्रिय रचनाकार थे, विचारों से कांग्रेस से प्रभावित थे और घर पर साहित्य और राजनीति के दिग्गजों का आना जाना था। जाहिर है मन्नू जी में लेखन के बीज बचपन से ही अंकुरित होने लगे थे। माता-पिता ने नाम रखा था महेन्द्र कुमारी, लेकिन जब से लिखने लगीं तो नाम बदलकर मन्नू कर लिया। 26 साल की थीं तभी 1957 में उनका पहला कहानी संग्रह आया-मैं हार गई। इससे पहले कई सालों तक साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कहानियां छपती रहीं। राजेन्द्र यादव तभी ज़िन्दगी में आए। मन्नू जी से दो साल बड़े थे राजेन्द्र जी। शुरुआती नाता लिखने-पढ़ने के दौरान जुड़ा, फिर शादी कर ली। राजेन्द्र यादव तब तक स्थापित हो चुके थे। उनके तीन कहानी संग्रह और उपन्यास आ चुके थे और राजेन्द्र जी के धुआंधार लेखन की चर्चा होने लगी थी। जाहिर है मन्नू जी उनसे प्रभावित हुईं और दोनों ने एक-दूसरे को जीवन साथी चुना।

मध्य प्रदेश के मंदसौर में 1931 में जन्मी मन्नू जी का शुरुआती वक्त कोलकाता में बीता और फिर बाद में दिल्ली आ गईं। एमए करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिन्दी पढ़ाने लगीं। मन्नू जी अक्सर कहती थीं –‘एक महिला के लिए घर संभालना, नौकरी करना, बच्चे की देखभाल करना और पुरुषवादी सामंती सोच का लगातार मुकाबला करने के साथ लिखना बेहद मुश्किल और चुनौती भरा काम होता है। इस व्यवस्था से लड़ते, समझौते करते, रिश्तों की गरिमा को भरसक बचाए रखने की कोशिश करते हुए रचनाकर्म जारी रखना आसान नहीं।’ वो कहतीं ‘घर में राजेन्द्र उनकी कोई मदद नहीं करते, वो सिर्फ अपने लिखने को प्राथमिकता देते, लिखने के लिए महीनों तक दूर कहीं चले जाते। उन्हें बच्ची को संभालने से लेकर, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, बाजार और घर के सारे काम करने होते, कॉलेज में बच्चों को पढ़ाना एक अहम ज़िम्मेदारी थी, वो भी एक परिवार था।’

दांपत्य जीवन के शुरुआती दौर थे और राजेन्द्र यादव के साथ मिलकर मन्नू भंडारी एक दुखांत प्रेमकथा लिख रही थीं। 1962 में इन दोनों लेखकों की ये किताब आई-एक इंच मुस्कान। उसके बाद का दौर और मुश्किल होता गया। बेटी रचना के आने के बाद रिश्तों की धूप छांव बढ़ने लगी और मन्नू जी के भीतर बंटी का चरित्र आकार लेता गया। धर्मवीर भारती ने आपका बंटी को धर्मयुग में धारावाहिक के तौर पर छापा और बाद में यह उपन्यास के तौर पर सामने आया। करीब से देखें और महसूस करें तो बंटी की मां शकुन में उन्होंने खुद को महसूस किया तो पिता अजय के चरित्र को उन्होंने तमाम पुरुषों के महिलाओं के प्रति पारंपरिक रवैये और रूढ़िवादी सोच के तौर पर पेश किया। ये उनका आत्मकथ्य भी है कि बंटी आज के तमाम टूटते परिवारों का एक प्रतिनिधि चरित्र है।

जो लोग मन्नू भंडारी को करीब से जानते हैं, उनके लिए ये समझना थोड़ा मुश्किल है कि वह ‘महाभोज’ जैसा जबरदस्त राजनीतिक उपन्यास भी लिख सकती हैं। लेकिन बिहार के बहुचर्चित बेलछी कांड ने उनके भीतर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उन्होंने महाभोज में पूरी राजनीतिक व्यवस्था, सत्ता और सामंती गठजोड़ के अलावा चुनावी राजनीति को बेहद रोचक और असरदार तरीके से पेश किया। महाभोज का नाट्य रूपांतरण हुआ और इसके तमाम शो देशभर में हुए। मन्नू जी की रचनाओं की उतनी लंबी-चौड़ी फेहरिस्त तो नहीं है लेकिन 6 उपन्यास और आठ कहानी संग्रह उनके नाम हैं। लेकिन मन्नू भंडारी ने हिन्दी साहित्य को जो दिया, वह कालजयी कृतियों के तौर पर हमेशा पढ़ा जाएगा।

मन्नू भंडारी का सृजन संसार

मन्नू भंडारी का पहला कहानी संग्रह आया 1957 में ‘मैं हार गई’। 12 कहानियों का यह संग्रह था, जिसे उन्होंने अपने पिता को समर्पित किया था। फिर राजेन्द्र यादव के साथ उनका पहला उपन्यास आया ‘एक इंच मुस्कान’। ये 1962 का साल था। इसी साल उनका एक और कहानी संग्रह छपा ‘एक प्लेट सैलाब’। उनका ये लेखन काल कोलकाता का है जब वहां मन्नू जी बालीगंज शिक्षा सदन और रानी बिड़ला कॉलेज में पढ़ाया करती थीं। 1964 में वो दिल्ली आ गईं और मिरांडा हाउस में हिन्दी पढ़ाने लगीं। 1991 में रिटायरमेंट के बाद दो साल तक उन्हें उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक का पद सौंपा गया। साठ के दशक में मन्नू जी ने ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’, ‘यही सच है’, ‘त्रिशंकु’ और ‘आंखों देखा झूठ’ जैसे कहानी संग्रह लिखे। बाद में बासु चटर्जी ने उनकी कहानी ‘यही सच है’ पर रजनीगंधा फिल्म बनाई जो बेहद चर्चित रही। 1966 में ही मन्नू जी ने एक नाटक भी लिखा ‘बिना दीवारों का घर’। वर्ष 1972 में लिखा गया उनका उपन्यास ‘आपका बंटी’ तो हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है। साल 1979 में मन्नू जी ने अपने उपन्यास ‘महाभोज’ में बेहतरीन तरीके से पेश किया, जिसका नाट्य रूपांतरण भी हुआ और आज भी ‘महाभोज’ रंगजगत के चर्चित नाटकों में शुमार किया जाता है। अस्सी के दशक में मन्नू जी ने रजनी, स्वामी, दर्पण और निर्मला जैसे धारावाहिकों की पटकथाएं भी लिखीं।

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