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सामाजिक यथार्थ की पड़ताल

पुस्तक समीक्षा
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मनमोहन गुप्ता मोनी

अमृतलाल मदान का नाम नाटक की दुनिया में नया नहीं है। उनके कई नाटकों का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। ‘ठहाके एक कंकाल के तथा अन्य नाटक’ में लेखक ने कुछ नए प्रयोग भी किए हैं। सोशल मीडिया की दुनिया में नाटक का स्वरूप भी कुछ-कुछ बदलता जा रहा है। अमृतलाल मदन का मानना है कि रंगमंच के अनेक झंझटों से बचते हुए उन्होंने आसान मार्ग अपनाने का प्रयास किया है। इसलिए उन्होंने ‘मनमंच के रंग’ शृंखला के अंतर्गत नाटक लिखे हैं। इस संग्रह में उनकी छह प्रयोगधर्मी रचनाएँ शामिल हैं।

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नाटक ‘ठहाके एक कंकाल के’ अत्यंत रोचक है, जिसमें लेखक ने यह दिखाया है कि आज की दुनिया में डॉक्टरों का रवैया कुछ बदल गया है। अब उनकी क्वालिफिकेशन बस यही रह गई है कि कैसे उनके अस्पताल का निर्माण हुआ और किसने उस अस्पताल का उद्घाटन किया। यदि किसी अस्पताल का उद्घाटन मुख्यमंत्री करता है तो इसके क्या मायने होते हैं, यह इसी नाटक में बताया गया है। अस्पताल में चर्चा भी बीमारी की नहीं, बल्कि पैसों की अधिक होती है। अस्पताल अब आर्थिक खुलेपन के कारण कॉर्पोरेट घरानों की तरह दिखाई देते हैं।

नाटक ‘डुलबोजर’ के पात्र विकलांग श्रेणी में आते हैं। उनके अंदाज ऐसे हैं कि इसमें उनकी सहज विकृति नहीं, बल्कि आधुनिकता का पुट दिखाई देता है। नाटक ‘घास गीली है अभी’ में भी पात्रों की सहज वार्तालाप स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। लेखक ने आज की नई विधा में कई प्रयोग किए हैं, लेकिन साथ ही आज की सच्चाई को भी बेबाकी से प्रस्तुत किया है।

पुस्तक : ठहाके एक कंकाल के तथा अन्य नाटक लेखक : अमृतलाल मदान प्रकाशक : साहित्यभूमि, नयी दिल्ली पृष्ठ : 100 मूल्य : रु. 395.

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