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पाठकों के पत्र

समय की पुकार पच्चीस जून के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बेटियां संवेदनशील’ समाज को बेटियों को प्राथमिकता देने का सुझाव देता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा, खेल, कर्तव्यनिष्ठा और माता-पिता की सेवा में बेटियां बेटों से आगे...
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समय की पुकार

पच्चीस जून के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बेटियां संवेदनशील’ समाज को बेटियों को प्राथमिकता देने का सुझाव देता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा, खेल, कर्तव्यनिष्ठा और माता-पिता की सेवा में बेटियां बेटों से आगे हैं। बेटों की तुलना में बेटियों का होना अधिक जरूरी है। इसके लिए कन्या भ्रूण हत्या रोकना, शिक्षा, सुरक्षा और समानता जरूरी है।

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शामलाल कौशल, रोहतक

बीमा क्षेत्र की खामियां

अठाईस जून के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित संपादकीय ‘अविश्वास का बीमा’ बीमा क्षेत्र की खामियों को उजागर करता है। एजेंट उपभोक्ताओं से जानकारी छुपाते हैं और अस्पतालों व कंपनियों की सांठगांठ से उपभोक्ता ठगे जाते हैं। कुल 65 फीसदी पॉलिसीधारकों को लाभों की जानकारी नहीं होती। बीमा जनकल्याण नहीं, मुनाफे का माध्यम बन गया है। एक मजबूत नियामक तंत्र की आवश्यकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सुरक्षा मानक सख्त हों

हाल ही में हुई विमान दुर्घटनाएं सुरक्षा में लापरवाही को दर्शाती हैं। तकनीकी प्रगति के बावजूद जिम्मेदार व्यवहार और कड़े नियम जरूरी हैं। हमें सुरक्षा मानकों पर कोई समझौता नहीं करना चाहिए। तकनीकी विकास के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसे हादसे न हों। यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि कई लोगों की जान की बात है। इसलिए इस विषय पर गंभीर विचार आवश्यक है।

दीपांशी सैनी, चौ. देवीलाल विवि, सिरसा

जलवायु संकट

जलवायु परिवर्तन विश्व की बड़ी समस्या बन गया है, जिससे पृथ्वी की व्यवस्था खतरे में है। कोयला, तेल और गैस के उपयोग से तापमान बढ़ रहा है, जिससे वायुमंडल को नुकसान हो रहा है। भारत मौसमी घटनाओं से प्रभावित देशों में छठे स्थान पर है। मानव निर्मित कारणों जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और वनों की कटाई से हालात गंभीर हो रहे हैं। यदि अब रोक नहीं लगी तो भविष्य में प्रभाव और भयंकर होंगे।

अर्चना गौतम, सीडीएलयू, सिरसा

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