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महाशक्तियों की निरंकुशता पर अंकुश
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जन संसद की राय है कि दुनिया पर वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही पांच महाशक्तियां मानवता को आघात पहुंचा रही हैं। विवेकशील-जागरूक समाज को युद्ध के खिलाफ शांति का बिगुल बजाना चाहिए।

शांति को चुनें

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आज इस्राइल-ईरान, रूस-यूक्रेन और अन्य युद्ध के जरिये मानवीय मूल्यों को नष्ट कर रहे हैं। गाज़ा में भूखे लोगों पर गोलियां चलाई जा रही हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं केवल मूकदर्शक बनी हुई हैं। महाशक्तियों को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं छोड़कर इंसानियत को प्राथमिकता देनी चाहिए। युद्धों पर खर्च किया जा रहा पैसा मानव कल्याण में लगना चाहिए। शांतिप्रिय देशों को मध्यस्थ बनकर समाधान निकालना चाहिए। इतिहास गवाह है कि हर युद्ध का अंत वार्ता से ही होता है। समय आ गया है कि हम विनाश की जगह शांति चुनें।

शामलाल कौशल, रोहतक

मुखर विरोध जरूरी

आज महाशक्तियों के टकराव से विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन रही है, जो संपूर्ण मानवता के लिए चिंता का विषय है। संयुक्त राष्ट्र व अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को निष्पक्षता से कार्य करते हुए मानवाधिकार हनन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। जनता की एकजुटता बड़ी ताकत बन सकती है। मीडिया और शिक्षित समाज को युद्ध मानसिकता का विरोध करना होगा। युद्ध केवल विनाश लाता है। यदि आज की पीढ़ी शांति, सह-अस्तित्व और संवाद को नहीं अपनाएगी, तो भविष्य अंधकारमय होगा।

अनूप कूमार गक्खड़, हरिद्वार

वर्चस्व का युद्ध

रोज़ाना इस्राइल और ईरान एक-दूसरे पर बम और मिसाइलें बरसा रहे हैं। रूस और यूक्रेन में भी लगातार हिंसा जारी है। दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका की बमबारी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। दुनिया के नेता शांति का मार्ग नहीं अपनाना चाहते, केवल अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। अमेरिका विशेष रूप से चालबाज़ देश है जो दुनिया को जाल में फंसाता है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं केवल नाम की बची हैं। हम बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ये देश विवेक से काम लें।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, रेवाड़ी

मूकदर्शक संयुक्त राष्ट्र

गाज़ा में रोटी मांगते लोगों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, यूक्रेन में युद्ध तीसरे वर्ष में है, और इस्राइल-ईरान संघर्ष ने पूरे मध्य-पूर्व को संकट में डाल दिया है। क्या अब शांति और कानून का राज केवल कल्पना रह गया है? संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं केवल नाममात्र की रह गई हैं। ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ के बाद इस्राइल को नए मोर्चों से भी जूझना पड़ रहा है, जिससे वहां की जनता की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। ऐसे में सवाल उठता है—मानवता की रक्षा कौन करेगा?

कु. रिया पुहाल, पानीपत

अमेरिका की दादागीरी

रूस-यूक्रेन और अब ईरान-इस्राइल युद्ध महाशक्तियों की सत्ता लोलुपता और प्रभुत्व की होड़ का परिणाम हैं, जो दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की ओर ले जा रहे हैं। अमेरिका, जो स्वयं को पंच-परमेश्वर मानता है, पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने में मदद करता है और ईरान को रोकने की कोशिश करता है—यह उसकी दोहरी नीति है। भारत ने बुद्ध की अहिंसा नीति अपनाकर युद्ध विराम कर लाखों जानें बचाईं। अब सभी देशों को मिलकर अमेरिका और रूस पर दबाव बनाना चाहिए ताकि यह विनाशकारी युद्ध रोके जा सकें।

भगवानदास छारिया, इंदौर, म.प्र.

पुरस्कृत पत्र

आत्मचिंतन करें

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रुज़वेल्ट ने विश्व शांति के लिए ‘पांच पुलिस वालों’—अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन—की अवधारणा दी थी। दुर्भाग्यवश, ये देश आज स्वयं प्रभुत्व की होड़ में लगे हैं। शांति स्थापना की बजाय वे नियंत्रण और विस्तारवाद की नीति अपना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं इन पर कोई लगाम लगाने में असफल रही हैं। दुनिया का बड़ा हिस्सा तनाव, हिंसा और असुरक्षा में जी रहा है। जब तक युद्धरत देश आत्मचिंतन नहीं करेंगे और यह नहीं समझेंगे कि युद्धों से कुछ हासिल नहीं होता, तब तक वैश्विक विनाश नहीं रुकेगा।

ईश्वर चंद गर्ग, कैथल

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