उत्तराखंड की चार धाम यात्रा प्राचीन परंपराओं और आस्थाओं का अद्भुत मिश्रण है, जिसमें शीतकालीन पूजा स्थलों की धार्मिक महिमा भी शामिल है।
उत्तराखंड स्थित चार धाम यात्रा अनादि काल से चली आ रही है। दुर्गम और उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण यह यात्रा केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि बानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने और मोक्ष की कामना के साथ भी की जाती थी।
यात्रा का प्रारूप और प्रक्रिया
पूर्व में चार धाम यात्रा का प्रारूप ऐसा था कि तीर्थ यात्रा में एक महीने से अधिक समय लग जाता था। चार धाम यात्रा शुरू करने से पहले गांव के रिश्तेदार तीर्थयात्रियों से भेंट कर उन्हें शुभकामनाएं देकर विदा करते थे। हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद पैदल मार्ग से यात्रा शुरू होती थी। इस यात्रा के मार्ग में स्थित छोटी-छोटी चट्टियों में विश्राम करते हुए, यात्री अपना भोजन खुद बनाते थे। यात्रा के पड़ाव में स्थित काली कमली की धर्मशालाओं में रुकने और अन्न की निःशुल्क व्यवस्था उपलब्ध रहती थी।
धार्मिक महत्व
चार धाम यात्रा का धार्मिक महत्व भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष की प्राप्ति की भावना से जुड़ा है। इस यात्रा का क्रम वामावर्त है, यानी सबसे पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, उसके बाद केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ। यमुनोत्री में यात्रा करने के बाद यात्री अपने सांसारिक राग-द्वेष को यमुना में प्रवाहित करते हैं, फिर गंगोत्री में चित्त की आध्यात्मिक शुद्धता प्राप्त करते हैं। उसके बाद केदारनाथ में महादेव की कृपा प्राप्त करते हैं और अंत में बदरीनाथ में नारायण के दर्शन करके पितरों के उद्धार की भावना से पूजा करते हैं।
आधुनिक समय में बदलाव
अब यात्रा में पूरी तरह से बदलाव आ चुका है। चारों धाम सुविधाओं से जुड़ गए हैं, और यात्री ग्रीष्मकाल या शीतकाल, कभी भी आकर अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर पुण्य अर्जित कर सकते हैं। वर्तमान में, चारों धामों में स्थित मंदिरों के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं, और शीतकालीन पूजा शीतकालीन गद्दी स्थलों पर होती है।
कपाट बंद होने का कारण
उत्तराखंड स्थित चार धाम के मंदिरों के कपाट शीतकाल के लिए बंद किए जाने का मुख्य कारण भौगोलिक स्थितियां हैं। सदियों पूर्व, जब भौगोलिक परिस्थितियां कठिन थीं, तो यह व्यवस्था बनाई गई कि नियत तिथि पर मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते थे, और शीतकाल में पूजा शीतकालीन पूजा स्थलों पर की जाती थी।
परंपराओं का निर्वाह
सदियों पूर्व स्थापित परंपराएं, बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद, अपने स्वरूप को कायम रखे हुए हैं। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने की परंपराएं आज भी कायम हैं। इन मंदिरों में छह महीने नर और छह महीने देवताओं द्वारा पूजा की परंपरा है। शीतकाल में जब इन मंदिरों के कपाट बंद होते हैं, तो चल विग्रह मूर्तियां अपने शीतकालीन पूजा स्थलों में पहुंचती हैं। यहां, कपाट खुलने तक चार धाम की पूजा अर्चना जारी रहती है।
गलत धारणाओं का निराकरण
हालांकि, लोगों के बीच यह धारणा बन गई है कि चार धामों के कपाट बंद होने के बाद पूजा-अर्चना भी बंद हो जाती है, जो कि गलत है। असल में, चल विग्रह मूर्तियां शीतकालीन पूजा स्थलों में आती हैं और वहां वही पूजा-अर्चना की जाती है। विषम भौगोलिक स्थितियों के कारण पूजा स्थलों में परिवर्तन होता है।
शीतकाल में यात्रा का क्रम
ग्रीष्मकाल में जिस तरह से चार धाम यात्रा का क्रम वामावर्त रहता है, अर्थात् यमुनोत्री से यात्रा शुरू होकर गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ तक जाती है, ठीक उसी प्रकार शीतकाल में भी यात्रा का क्रम वही रहता है।
दर्शन यात्रा
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पावन सान्निध्य में शीतकालीन चार धाम दर्शन यात्रा आगामी 4 दिसंबर से प्रारंभ हो रही है। इस यात्रा में देश भर के कई राज्यों के यात्री शामिल होंगे। यात्रा दल पहले यमुनोत्री के शीतकालीन पूजा स्थल खुशीमठ, फिर गंगोत्री के शीतकालीन स्थल मुखवा, उसके बाद केदारनाथ के ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ और अंत में बदरीनाथ के शीतकालीन पूजा स्थल ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह मंदिर पहुंचेंगे।
शंकराचार्य का मार्गदर्शन
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बताते हैं कि भौगोलिक परिस्थितियों और देव पूजा के लिए नियत समय होने के कारण धामों के मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। परंपरानुसार, चल विग्रह मूर्तियां शीतकालीन पूजा स्थलों में आती हैं। वह यह भी बताते हैं कि शीतकालीन पूजा स्थलों में दर्शन से वही पुण्य लाभ अर्जित होता है, जो ग्रीष्मकाल में धामों में दर्शन से प्राप्त होते हैं। चित्र लेखक

