उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत से पहले, समय से पहले जन्मे शिशुओं (प्रीमैच्योर बेबी) का जीवित रह पाना लगभग असंभव माना जाता था। इन्हीं दिनों, एक व्यक्ति ने एक पोल्ट्री फार्म पर यह देखा कि अंडों को एक गर्म बॉक्स में रखकर कृत्रिम रूप से सेया जा रहा है। यह देखकर उसके मन में विचार आया कि यदि अंडों को गर्मी और सुरक्षित वातावरण देकर जीवित रखा जा सकता है, तो फिर समय से पहले जन्मे शिशुओं के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती। इस व्यक्ति ने प्रसिद्ध प्रसूति रोग विशेषज्ञ पियरे बुडिन के साथ कार्य किया था। इसके बाद उन्होंने समयपूर्व जन्मे शिशुओं को बचाने के लिए इनक्यूबेटर का प्रयोग शुरू किया। उन्होंने प्रदर्शनी लगाकर इनक्यूबेटर में शिशुओं को रखा और उनकी देखरेख के लिए प्रशिक्षित नर्सों की नियुक्ति की। कुछ लोगों ने इस प्रयास का मजाक भी उड़ाया, लेकिन उन्होंने आलोचनाओं की परवाह नहीं की। कई माताएं, जिनके शिशु समय से पहले जन्मे थे, उन्हें बचाने की आशा में सहर्ष उन्हें सौंप देती थीं। उनकी अथक मेहनत और वैज्ञानिक सोच के कारण वे लगभग सात हजार प्रीमैच्योर शिशुओं को बचाने में सफल रहे। समय के साथ इनक्यूबेटर ने अस्पतालों में जगह बना ली और नवजात देखभाल का अहम हिस्सा बन गया। इनक्यूबेटर के माध्यम से हज़ारों बच्चों को जीवन देने वाले इस महान व्यक्ति का नाम था मार्टिन कॉनी, जिन्हें आज भी ‘इनक्यूबेटर डॉक्टर’ के नाम से याद किया जाता है।
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