एक बार रामकृष्ण परमहंस जी के पास विचार विमर्श के लिए समाज के अनेक प्रतिनिधि मौजूद थे। युवक, किशोर, वयस्क, बुजुर्ग आदि। सवाल और जवाब का गंभीर सत्र चल रहा था। तभी अवसर पाकर एक किशोर ने भी उनसे प्रश्न किया, ‘मान्यवर, प्रेम करते हुए हम धार्मिक रह सकते हैं। तो प्रेम क्या है?’ रामकृष्ण ने सहज भाव से कहा, ‘तुम जब एक विद्यार्थी हो तो विद्या से ही अगाध प्रेम करो। गृहस्थ बनो तो अपने कुटुंब से, परिवार से अनंत प्रेम रखो। वानप्रस्थ में आओ तो परमार्थ को ही प्रेम बना लो। संन्यास में आओ तो त्याग से ही प्रेम करने लगो। बस यही है प्रेम की परिभाषा। प्रेम जैसा भी हो पर याद रखो कि नफरत किसी से मत करो।’ इतनी सुन्दर परिभाषा सुनकर वहां उपस्थित सभी अभिभूत हुए।
प्रस्तुति : मुग्धा पांडे
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