भगवान बुद्ध से एक बार उनके एक शिष्य ने जब पूछा कि दुनिया में ज्यादातर लोग दुखी क्यों रहते हैं तो बुद्ध बोले, ‘जब लोग अपने स्वार्थ में सिमट जाते हैं तो उनका दुखी होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर वे परोपकार का कार्य करें तो उनका दुख कम हो सकता है।’ किंतु बुद्ध के जवाब से शिष्य संतुष्ट न हुआ। तभी बुद्ध और उनके शिष्य ने देखा कि एक गहरे गड्ढे में कीचड़ में फंसा एक खरगोश बाहर निकलने को छटपटा रहा है। बुद्ध ने शिष्य से कहा, ‘वह देखो, कीचड़ में फंसा खरगोश कितना परेशान है! पर उसे इस हालत में देख कर तुम्हें कैसा लग रहा है?’ खरगोश की यह हालत देख शिष्य दुखी हो गया और पलक झपकते ही अपने कपड़े उतार कर कीचड़ में उतर गया। बड़ी मुश्किल से वह खरगोश को कीचड़ से बाहर सुरक्षित निकाल पाया। खरगोश की जान बच जाने से शिष्य का चेहरा अब खुशी से चमक रहा था। तब बुद्ध ने उसे समझाया, ‘देखो! जब खरगोश कीचड़ में फंसकर तड़प रहा था तो उसका दुख तुम्हारा दुख हो गया था, लेकिन जब तुम अपना स्वार्थ छोड़कर खरगोश को विपदा से बाहर निकाल लाए तो तुम्हारा दुख दूर हो गया और तुम खुश हो गए।’
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