आलोच्य कृति में ग़ज़ल विधा में काफियों और रदीफ के नए प्रयोगों के साथ कहन का नया अंदाज़ देखा जा सकता है। बहुमुखी रचनाधर्मिता के पर्याय तथा छंद परंपरा के प्रखर कवि अशोक ‘अंजुम’ की सत्तर ग़ज़लों का संपादन सफलता सरोज ने किया है, और शीर्षक है ‘तेरा-मेरा रिश्ता क्या?’
विभिन्न बहरों की इन ग़ज़लों में एक ओर जहां सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं पर व्यंग्य के माध्यम से करारी चोट भी की गई है। इस रचनाधर्मिता में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहलुओं को बेबाकी से अभिव्यक्त करते हुए रचनाकार ने जरूरी लेखकीय दायित्व निभाया है। एक बानगी—‘सूरत हमारे देश की सबने खराब की/ अब फिर से ज़रूरत है हमें इंकलाब की।’
संग्रह में अनेक रचनाएं मार्मिक शब्द-चित्र प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं, जिन्हें पोस्टर-कविता की तरह पोस्टर-ग़ज़ल का रूप दिया जा सकता है, उदाहरण के रूप में—‘पीड़ा का अनुवाद है आंसू, एक मौन संवाद है आंसू/ हो गई लंगड़ी व्यवस्था, खोखला है जिस्म भी/ और उन पर हैं घुनी बैसाखियां, कुछ कीजिए...’
जैसी मुहावरेदार भाषा, कलात्मक रदीफ तथा काफियों का नया प्रयोग इन ग़ज़लों को भीड़ से अलग करने की क्षमता रखता है। इन ग़ज़लों में रवानगी, शालीनता, नयापन तो है ही, व्यंग्य की मारक क्षमता भी देखते ही बनती है—‘अपना ईमान तू यहीं रख जा/ उस तरफ साधुओं का डेरा है।’
कुल मिलाकर कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से ये ग़ज़लें बेहतरीन हैं।
पुस्तक : तेरा-मेरा रिश्ता क्या ? संपादक : सफलता सरोज प्रकाशक : अमन प्रकाशन, कानपुर पृष्ठ : 104 मूल्य : रु. 175.

