Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

रंग-बिरंगे अहसासों के स्याह सच

पुस्तक समीक्षा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

लेखिका सुरिंदर नीर का पंजाबी उपन्यास ‘चश्म-ए-बुलबल’ और उसका हिंदी अनुवाद, जो सुभाष नीरव द्वारा किया गया है, साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और विचारणीय है। इस उपन्यास में निहित घटनाक्रम और पात्रों के जटिल रिश्तों का विश्लेषण किया गया है।

ज्यों-ज्यों उपन्यास आगे बढ़ता है, पाठक पात्रों के जीवन, उनके व्यवहार, मातृसत्तात्मक संबंधों, कश्मीरी बुनकरों की पीड़ा और समाज की निर्मम यातनाओं का सारगर्भित अनुभव करता चलता है। मुस्तफा इस उपन्यास का नायक है और सारी घटनाएं उसके इर्द-गिर्द घूमती हैं।

Advertisement

पोशमाल, मुस्तफा की प्रेमिका, थी जिसका जबरन, बिना कबूलनामा किए, कादरे से निकाह करवा दिया जाता है। कादरा, पोशमाल पर उसके प्रेम-प्रसंग के कारण अत्याचार और बर्बरतापूर्ण शोषण करता है। पोशमाल की चुप्पी, मजबूरी और लाचारी पुरुष के अहंकार और उसकी सहनशीलता को उजागर करती है। पोशमाल की नारकीय जिंदगी में उसका केवल ससुर ही सहारा बनता है।

Advertisement

दूसरी तरफ, मुस्तफा पोशमाल को चाहता था, लेकिन वह उसकी मजबूरियों को समझने के बजाय, उसे बेवफाई का आरोप लगाता है। उपन्यास में इस संबंध की जटिलताएं पाठक को विचलित करती हैं, क्योंकि पोशमाल की स्थिति सचमुच दयनीय है, और उसकी तकलीफों का कोई अंत नहीं दिखता।

मुस्तफा के जीवन में कभी सजीवता होती है, तो कभी निर्जीवता। कभी वह बुत की तरह स्थिर हो जाता है, तो कभी पुरखों की सारंगी के तारों की आवाज़ से अतीत के अंधेरे से वर्तमान के उजाले में अपने दादा और बाबा के आशीर्वाद की तलाश करता है।

लेखिका ने सभी पात्रों का चरित्र चित्रण कश्मीरी शॉल के बुनने जैसे किया है, जिसमें रंग-बिरंगे धागों को एक ही सूत्र में पिरोकर सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। सुख-दुख से अभिभूत पात्रों के सामूहिक स्वर पाठक में अगले घटनाक्रम को जानने की उत्सुकता पैदा करते हैं।

उपन्यास में मजहब और नफरत की आड़ में युवा पीढ़ी का पथभ्रष्ट होना एक चिंताजनक विषय है, जिसकी आंच से मुस्तफा का जवान बेटा ‘दानिश’ भी नहीं बच पाता। पुलिस के हाथों दानिश और उसकी मां पाशा का मारा जाना मुस्तफा को गहरी निराशा से भर देता है। मुस्तफा की बेटी ‘चश्म-ए-बुलबुल’ उसका एकमात्र सहारा बनती है। बेटी द्वारा अपने पिता को संबल देना, तदबीरों और संवादों के माध्यम से जीवन के प्रति उत्साह भरना उसके लिए संजीवनी बनता है।

पुस्तक : चश्म-ए-बुलबुल लेखक : सुरिंदर नीर अनुवादक : सुभाष नीरव प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर, दिल्ली पृष्ठ : 239 मूल्य : रु. 450.

Advertisement
×