बीज
बीज कहता है कि,
देखनी है मेरी सामर्थ्य,
तो देखो,
सीना ताने इन
गगनचुंबी वृक्षों को।
बीज कहता है कि,
देखनी है मेरी शक्ति,
तो देखो,
झंझावातों में भी
निर्भीक खड़े इन वृक्षों को।
बीज कहता है कि,
मेरे छोटेपन पर मत जाना,
मेरे अंदर एक
पीपल की संभावना को
स्वीकार करो।
बीज कहता है कि,
जाननी है मेरी सहनशक्ति,
तो पांव से कुचल दो मुझे,
मैं माटी में मिलकर
पनप जाऊंगा फिर से।
बीज कहता है, तुम
फेंक दो मुझे तुम
झुलसती धरा के सीने पर,
फिर देखो बरगद बन कर
कैसे मैं सबको छांव दूंगा।
बीज कहता है कि,
देखनी है मेरी जिजीविषा,
तो देखो पत्थरों और
कन्दराओं में भी
तलाश लेता हूं मैं जीवन,
बन कर नव कोंपल।
बीज कहता है कि,
रोप दो प्यार से
मुझे माटी में,
अपनी जड़ें फैलाकर
बचा लूंगा धरा को मैं
बांझ होने से।
बीज कहता है कि,
देखना है मेरे प्यार को,
तो जान लो, मेरे अंकुरण से ही
मां का दर्जा पाएगी
यह पावन धरा।
बीज कहता है कि,
मां का रुतबा पाने की खुशी में,
हो जाएगा
धरा का अंग-अंग हरा
और सुनहरा।
बीज कहता है।
