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स्मृतियों का काव्य चिंतन

पुस्तक समीक्षा

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प्रकृति प्रेमी कवि रमेश पठानिया का सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह ‘एक नदी का न होना’ मुख्यतः जिस नदी के न होने अथवा धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोते जाने की ओर इशारा करता है, वह हिमाचल की कुल्लू उपत्यका की व्यास नदी है। पूर्व प्रकाशित संग्रहों की तरह इस पुस्तक में भी नदी के साथ पेड़-पौधे, पहाड़ व परिवेश और पुरानी यादें अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। अपितु व्यास नदी के प्रति उनकी चिंता अधिक मुखरित हुई है और कवि इसका अस्तित्व बचाने के प्रति कृतसंकल्प दिखते हैं। यहां तक कि यह इच्छा भी जाहिर हुई है कि व्यास नदी, जो कई भूभागों की जीवनदायिनी है, को देश की धरोहर के रूप में मान्यता मिले ताकि 2023 के बादल फटने जैसी हो रही प्राकृतिक आपदाओं के चलते इसके संरक्षण की समुचित व्यवस्था हो।

विकास के नाम पर नदियों का भी अतिक्रमण हो रहा है, जिसका दुष्प्रभाव मानव जीवन पर भी दिखने लगा है। कवि का मानना है कि नदियां और स्त्रियां अत्याचार का बदला सूद समेत लेती हैं। फलस्वरूप, नदी के न होने की कल्पना से वह सिहर उठते हैं—‘मैं सब तस्वीरों, निकोलस रोरिक की पेंटिंग्स को, वादी को-किनारों को, पल भर के लिए बिना नदी के देखता हूं और शून्य हो जाता हूं (नदी का न होना)।’ शायद इसीलिए वे ‘नदी को देखो’ के माध्यम से इसे गंभीरता से हर पहलू से विचार करने का आह्वान करते हैं। इस तरह, नदी और विशेषकर व्यास के प्रति कवि के हृदय में उपजे कई भाव संग्रह में दर्ज हैं।

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पुस्तक : एक नदी का न होना लेखक : रमेश पठानिया प्रकाशक : शुभदा बुक्स, साहिबाबाद, उ.प्र. पृष्ठ : 124 मूल्य : रु. 220.

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