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अनुभवों की धूप-छांव में रची कविताएं

पुस्तक समीक्षा

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अनिल सोनी देश के प्रमुख अखबारों में हर रोज व्यंग्य का कॉलम लिखते रहे हैं और उनके व्यंग्य संग्रह ‘कबाड़ी का सिक्का’ और ‘शव संवाद’ उनके खाते में शामिल हैं। वे मूलत: पत्रकार हैं। वैसे साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं, और पत्रकारिता में खबरों की जुगलबंदी जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य ही तो है। यह भी तो सही है कि धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, अज्ञेय और मनोहर श्याम जोशी पत्रकारिता और लेखन की समानांतर पगंडडियों पर एक साथ चलते रहे। साथ ही, समानांतर विधाओं में कई भव्य कीर्तिमान स्थापित किए। कविता लिखना अनिल सोनी के लिए ‘सुकून की पलकें खुलना’ जैसा है। जैसे कवि कहते हैं, ‘कोई एक अधूरी, अनगढ़ी और कमजोर-सी रचना भी मन को धोकर जब बाहर आती है, तो सुकून की पलकें खुल जाती हैं।’

अनिल सोनी के सद्य: प्रकाशित पहले कविता संग्रह ‘पंख जिंदा है’ की यह पंक्तियाँ काबिलेगौर हैं जो बड़ी कुशलता से लोकतंत्र के पाखंड का पर्दाफाश करती हैं :‘यही तो कौशल/ अब लोकतंत्र में/ हम जिन्हें चुन रहे। वे केवल दरार दिखाकर/ लोकतंत्र को/ फिर से बुन रहे।’

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कवि की इन पंक्तियों का व्यंग्य पाठक की चेतना में गहरा उद्वेलन पैदा कर देता है कि आखिर इस देश के तथाकथित कर्णधारों ने इस देश के लोकतंत्र को किस दोराहे पर लाकर सड़ा दिया है— ‘रंगमंच के सारे/ पर्दे फटे हुए झांक रहे/ किरदार दर्शकों की/ दुकान में/ बिक रहे हैं किस्से/ अपने हिंदुस्तान के/मजबूरियों के पांव/ चलता लोकतंत्र।’

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अनिल सोनी की इन कविताओं में हमारे समय की खतरनाक खबरें दर्ज हैं जो हमें चौकस करती हैं कि ऐसा क्या हुआ कि—‘वर्षों पहले देशभक्ति/ फांसी की जिस रस्सी पर/ उगी मिलती थी/ आज वहीं उगा है देशद्रोह/ जहां आजादी की/ मशाल जली थी।’

‘मैं मोती’ इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें मोती के माध्यम से यह सवाल उठाया गया है कि निरंतर सपने गांठते रहने के बावजूद वह हर समझौते में अभागा क्यों है? ‘बाप’ शीर्षक कविता एक साथ पाठक को भीतर से कचोटने वाले कई सवालों के रू-ब-रू लाकर खड़ा कर देती है—‘अपनी ठोकरों को/ कभी बाप की/ हथेली पर गिनना/ गिनना उस चाबुक की/ चोट को/ तुम्हारे खिलखिलाने के लिए/ जिसे बाप ने खाया।’

अनिल सोनी के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह ‘पंख ज़िंदा है' में हालांकि विपरीत परिस्थितियों का एक बीहड़ है, लेकिन कवि किसी भी स्तर पर स्वयं को क्षण भर के लिए भी पस्त हिम्मत नहीं पाता। यही खासियत इन कविताओं को विशेष पहचान देती है।

समग्रतः यह कविताएं अपने समवेत पाठ में कवि के स्वार्जित अनुभवों की धूप-छांव में से छन कर सामने आई हैं और हमारे समय के विद्रूप की निशानदेही करती हैं। इन कविताओं की भाषा वही है जो हम और आप बोलते हैं।

पुस्तक : पंख ज़िंदा है कवि : अनिल सोनी प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन लि., गाजियाबाद, उ.प्र. पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 445.

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