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नशाखोरी से मुक्ति और शोध की रोचक दास्तान

पुस्तक समीक्षा
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दस वर्ष तक नशे में सिर से पांव तक डूबे रहना, फिर उससे बाहर निकल नियमबद्ध जीवन में वापस आना और सफलता पाना बेहद कठिन है। लेकिन अक्षय बहिबाला ने नशाखोरी को मात देकर पहले एक कंप्यूटर हार्डवेयर स्टोर में काम किया। फिर सिम कार्ड बेचे और कई साल तक किताबें बेचीं।

बहिबाला ने ओडिशा के गांवों में घूम-घूमकर नशीले पदार्थों की लत ,खपत और पैदावार संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की और उसे किस्सागोई के अंदाज़ में ‘रसभांग’ सरीखी किताब की शक्ल में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया। अंग्रेज़ी में लिखी इस किताब का अनुवाद पत्रकार व्यालोक पाठक ने किया है।

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पुस्तक में पांच अध्याय हैं। ‘भांग और गांजे के साथ मेरे दिन’ नामक पहले भाग में ओडिशा स्थित पुरी शहर में रोड के इर्द-गिर्द डेरा जमाए देश-विदेश के अफ़ीमचियों, गंजेड़ियों और भंगेड़ियों के साथ बिताए गए दिनों की स्मृतियां दर्ज की गई हैं। इनमें चिलम फूंकने वाली एक इस्राइली महिला, ध्यान लगाने को गांजा पीने वाली एक फ़्रेंच औरत और हिप्पियों के रोचक किस्से हैं।

दूसरे भाग ‘भांग और गांजे के रोजनामचे’ में एक भांग विक्रेता दावे से कहता है—‘साहब, पुरी में दस से ज़्यादा लाइसेंसी भांग की दुकानें हैं, लेकिन भांग के अवैध ठिकाने सैकड़ों हैं... तीस किलो भांग बेचकर मुझे महीने भर में बीस हज़ार का मुनाफ़ा होता है। इससे पांच लोगों के परिवार का पेट पालना मुश्किल है।’

ओडिशा में भांग की ठंडई, भांग की लस्सी और भांग का खुशबूदार शरबत बनाने और पीने की रीत उतनी ही पुरानी है जितनी स्वयं ओडिशा। यहां आबकारी विभाग द्वारा भांग की ख़रीद और वितरण की व्यवस्था सहस्राब्दियों से चली आ रही है। सन‍् 1989 से पहले सम्बलपुर, ढेंकनाल और कटक जिलों में किसानों को भांग की खेती करने के लिए आबकारी विभाग लाइसेंस भी देता था। अब भी कई जिलों में लाइसेंस प्राप्त भांग की दुकानें संचालित हैं। हर रविवार ओडिशा के सभी गांवों व शहरों में त्रिनाथ के मेले लगते हैं, जहां गांजे की भारी अहमियत है।

तीसरा भाग अफ़ीम पर केंद्रित है। इसमें एक अफ़ीम कटर, अफ़ीम कार्ड रखने वाले एक सुनार, अफ़ीम खाकर हैजे से बची पार्वती, अफ़ीम के लती अन्य कार्डधारकों और भारत में अफ़ीम उन्मूलन से जुड़ी अतीव जिज्ञासापरक कथाएं दी गई हैं।

‘गांजे के खेतों में’ नाम वाले चौथे भाग में मलकानगिरी, कोरापुट, रामगढ़, गजपति, कंधमाल और बौध जिलों में बसे आदिवासी बहुल गांवों की तस्वीर पेश की गई है, जहां आबकारी विभाग हर साल हज़ारों एकड़ में फैले अवैध गांजा बागानों को योजना बनाकर नष्ट करता है, जिनके सहारे आदिम लोग अपनी रोटी का जुगाड़ करते हैं।

पुस्तक : रसभांग लेखक : अक्षय बहिवाला प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 196 मूल्य : रु. 299.

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