धनपतराय बहराइच में

धनपतराय बहराइच में

चित्रांकन : संदीप जोशी

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

यही कोई ढाई महीने बहराइच में बिताकर धनपतराय प्रतापगढ़ की ओर निकल पड़े। जिला बहराइच उनके लिए कई तरह से अच्छा रहा। अपने घर लमही से इतनी दूर एक सरकारी व्यवस्था के तहत जीवन में पहली बार वो निश्चिंत भाव से रह पाये थे। निश्चिंतता यों कि पहली सरकारी नौकरी की शुरुआत यहीं से हो रही थी। आगे की ज़िंदगी तंगहाली से कुछ हद तक बची रहेगी इस बात का आश्वासन भी थी यह सरकारी नौकरी। बहराइच के बाद प्रतापगढ़ के जिला स्कूल में फ़र्स्ट एडिशनल का काम मिलना एक तरह से उनकी पदोन्नति भी तो थी।

बीसवीं शताब्दी बिलकुल मुहाने पर थी। सन‍् उन्नीस सौ की तिथि दो जुलाई से बीस सितम्बर तक उनका गौतम बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती से जुड़े शहर बहराइच में रहना हुआ। ये दिन उनके क्रांतिकारी स्वभाव को और अधिक पुष्ट करने वाले साबित हो रहे थे। नौकरी के साथ-साथ समाज और देश में बदलाव कैसे लाना है? इसका खाका पढ़े-लिखे नौजवान धनपतराय के दिलोदिमाग में लगभग तैयार हो चुका था।

प्रतापगढ़ जाते हुए धनपतराय को कुछ दूरी तक तांगे की भी सवारी करनी थी। उनको थोड़ा-बहुत जान चुके एक तांगावान ने यह जिम्मेदारी ले ली थी। तांगे का एक अलग संगीत होता है। हदों को पार कर जाने वाले जानदार घोड़े जैसे जानवर की अनुशासित तेजी को टापों की आवाज़ से सुना जा सकता है। धनपतराय उसी संगीत के साथ एकाकार हो रहे थे :

‘मास्टर साहिब, हमारे शहर में बहुत कम रहे? आप से बतियाकर दुनियादारी को समझना और समझाना बहुत आसान हो जाता था।’ तांगेवाला युवा धनपतराय से बोला।

‘दुनियादारी...।’ बस इतना ही कहकर धनपतराय अपनी तनी हुई मूंछों के साथ मुस्कुराए।

‘क्यों... क्यों, मास्टर साहिब!’

‘अपनी उम्र का बीसवां साल पूरा कर रहा यह धनपतराय दुनियादारी के मामले में अनाड़ी है। और आप हैं कि उसे दुनियादारी का...। अरे भाई, आपके शहर आने से पहले सच्चाई का साथ देने की अपनी आदत के मुताबिक़ कोशिश की और दुनियादारी में मैं फेल कर गया था। तुम यह नहीं जानते होंगे, दोस्त!’

‘वह कैसे?’ तांगेवाले ने पूछा।

‘भाई, इस नौकरी के पहले एक छोटी-मोटी नौकरी मिल गई थी। माना छोटी थी, मगर उसी से घर चल रहा था सो मेरे लिए बहुत बड़ी थी। हुआ यों कि चुनार के मिशन स्कूल में जहां कार्यरत था वहीं एक मौलबी साहब भी थे। नाम इब्ने अली। इनको स्कूल के अंग्रेज अधिकारी कुछ ज्यादा ही लगातार परेशान किए जा रहे थे। मैं जज्बाती हो गया, भाई! रहा न गया। उस अधिकारी के खिलाफ मौलबी साहब का खुलकर साथ देने लगा। इससे पहले भी एकाध बार अंगरेजी का रौब गांठने वालों से पंगा ले चुका था। खूब चांय-चांय हुई, पर दुनियादारी से मैं अनजान अडिग रहा। फिर क्या था, मौलबी साहब सहित मैं भी चुनार वाले उस स्कूल से बाहर कर दिया गया। अब तो न घर भेजने को रुपये थे, और न ही अपना खर्च चला पाने का कोई जरिया। जनाब सड़क पर आ गया। आज के जमाने में कोई मिली हुई नौकरी हाथ से निकल जाने का मतलब है पांव के नीचे से ज़मीन का खिसक जाना।’

गरीबी के उस घटाटोप अंधेरे को याद करते हुए धनपतराय ख़ुद में खो गए। सोचने लगे कि दुनियादारी के जोड़-तोड़ में असफल शख्स के लिए भीतर बची सच्चाई का एक टिमटिमाता दीया बहुत बड़ी पूंजी होती है। जो कुछ मेरे पास है वह उसी पूंजी का कमाल है। धनपतराय को लोगों को सुनना और उन तक अपनी बात सीधे-सादे शब्दों में पहुंचा पाना प्रीतिकर था। इसी कारण से तांगेवाले को अपनी असली पूंजी का महात्म्य बतला देने के मन से बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जोड़ा :

‘दोस्त, चुनार की नौकरी चली जाने के बाद बनारस लौट आया। संयोग ही था कि क्वींस कॉलेज के जाने-माने प्रधानाचार्य बेकन साहब से परिचय हो गया था। उनसे भेंट हुई तो सच बतलाऊं मेरे इस विश्वास को ताकत मिली कि सीधे-सच्चे और मेहनती लोगों को कोई न कोई मददगार मिल ही जाता है। बेकन साहब की नज़र में दूरदराज के ऐसे विद्यालय थे जहां काम करने वाले लोगों की जरूरत थी। उनमें से कुछ स्कूल के प्रमुखों को उन्होंने पत्र लिखे। कुछ ही माह में किए गए प्रयासों का नतीजा यह निकला कि मुझे आपके शहर बहराइच के सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में पढ़ाने का न्योता आ पहुंचा। भाई, अपने बेकन साहब अंगरेजी सलीके वाले आदमी हैं। मुझ बेकार को बड़े ही करीने से सूचना देते हुए कहा,

‘धनपतराय, बहराइच जाना पसंद करोगे। बीस रुपये मासिक वेतन पर तुम्हें सरकारी जिला स्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में पढ़ाना होगा।’

‘ससुरे अंगरेज ऐसे ही बोलते हैं, मास्टर साहिब! ये बताओ बहराइच कैसा लगा?’ तांगेवाले ने बातों के बीच में अपनी बात जोड़ते हुए कहा।

‘जिला बहराइच मेरे लिए बहुत अच्छा रहा। अरे भाई, बाला ऋषि से लेकर गौतम बुद्ध तक की तपोस्थली रही है बहराइच। पवित्र सूरज कुंड पर बनी दरगाह है यहां। एक मलाल रह गया कि जेठ का मेला नहीं देख पाया।’

‘मास्टर साहिब, इसी बहाने एक बार फिर बहराइच आ जाइएगा।’

‘हां, क्यों नहीं, पर असल बात कहूं तो जब बेकन साहब ने मुझे बहराइच में नौकरी की खबर दी तो यह कैसी जगह होगी-इसको लेकर कम और बीस रुपये हर महीने तनख्वाह को लेकर ज्यादा रोमांचित था। रुपयों की सख्त जरूरत जो थी। फिलहाल अपना बोरिया-बिस्तर बांध अब बनारस से बहराइच को निकलना था। पूर्वांचल के केन्द्र काशी से अवधी अंचल के किनारे के जिलों में से एक जिला। नेपाल के बार्डर को छूता हुआ तराई का जिला। भाई, ‘हर हर महादेव’ वाली काशी से ‘जय सियाराम’ वाले इलाके में आना हुआ है। यहां कल-कल बहती सरयू अपनी सहायक नदियों के साथ पूरे इलाके को हरा-भरा रखे हुए है। हहाराती घाघरा नदी जिले की सीमा तय करती है। यहां तो मैंने पाया कि खेती-पाती, बाग-बगीचे से जुड़े काम-धंधे आमदनी के जरिये हैं। गुलाब खास की महक... आ हा हा, क्या आम थे! भाई, सीधे-सादे आप लोग अपने में मस्त रहते हो।’

ये सब कहते हुए धनपतराय एकटक तांगेवाले की आंखों की बढ़ती चमक को निहारे जा रहे थे। सच में, अपने देस-समाज की तारीफ़ किसे नहीं अच्छी लगती? फिलहाल उन्होंने अपनी बात को जारी रखा :

‘अंगरेजी कैलेण्डर के हिसाब से, भैया! बीसवीं शताब्दी का यह पहला शैक्षिक-सत्र है जो इस साल उन्नीस सौ के जुलाई माह से शुरू हुआ। एक जुलाई इतवार थी और दो जुलाई को सोमवार। वक्त पर स्कूल में मुझे अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देनी थी। अंगरेज राज में वक्त की कीमत को बिना समझे सरकारी नौकरी की राह आसान नहीं है। पहली नौकरी का उत्साह सहेजे मैं चुपचाप ठीक समय पर दो जुलाई को बहराइच के सरकारी जिला स्कूल पहुंच गया। स्कूल में चार शिक्षक थे और मैं पांचवें नम्बर पर था। देखो, आज जाने की भी घड़ी आ गई।’

‘अच्छा, मास्टर साहिब! आप इतने दिन यहां अकेले ही रहे, हमें ज्यादा तो आपके परिवार के बारे में नहीं पता, लेकिन ई रामकली अउर अमृतराय कौन है? एक दिन हमारे तांगे पर कलम-डायरी लिए इनका बुदबुदाये रहे थे।’

यह सुनकर जोर से हंसते हुए धनपतराय बोले :

‘भाई, ये हमारी कलम के सिपाही हैं।’

‘मतलब!’ तांगेवाले ने एक शब्द में बड़ा सवाल पूछ लिया था। इस पर धनपतराय ने अपने बचपन की एक कहानी सुनाते हुए कहा :

‘दूर रिश्ते के एक मामू साहब थे। बिन मां के मुझ बच्चे पर बहुत रोब झाड़ते। बात-बात पर बिगड़ते। पिता जी से चुगली खाते और जब-तब मैं पीटा जाता। उम्र हो चली थी, मगर मामू से कोई ब्याह करने को राजी न था। इस कारण से और भी चिढ़े रहते। एक दिन मामू बन्द कमरे में दूसरी जाति की किसी औरत के साथ पाये गये। गांव वालों ने उनकी खूब धुनाई की। महीनों हल्दी-दूध पीते रहे, मगर मुझ बच्चे के प्रति उनका वही व्यवहार रहा। कुछ बदला नहीं था। मेरी नज़रों से वो गिर चुके थे। गांव भर में उनकी थू-थू होती थी, लेकिन उनको अक्ल नहीं आने को थी। एक दिन मैंने उनकी गाथा मजाकिया नाटक की तरह लिख मारी और उनके सिरहाने रखकर स्कूल चला गया। नाटक में उन्ही की तरह के एक लम्पट किरदार की खबर ली गई थी। उसे पढ़कर मामू ने इतनी शर्मिंदगी महसूस की कि जो काम गांव वालों की धुनाई से नहीं हो पाया था वह उस नाटक के किरदार ने कर दिखाया। मामू अगले ही दिन गांव से नौ दो ग्यारह हो गए। मुझ तेरह साल के दुबले-पतले बच्चे को उस दिन बुरे लोगों और बुराइयों को सबक सिखाने का बहुत बड़ा हथियार मिल गया था। भाई, अब सरकारी नौकरी से बंधा मैं कोई क्रान्तिकारी तो हो नहीं सकता हूं। ऐसे में ‘रामकली,’ ‘अमृतराय’ जैसे मेरे किरदार ही अब समाज जागरण का काम संभालेंगे...।’

तांगे का सफ़र खत्म होने को था, मगर बातें जारी थीं। धनपतराय बहराइच में अभी न ‘नवाबराय’ हुए थे और न ही ‘प्रेमचंद’, लेकिन हां, एक पुख्ता किस्सागो तो हो ही चुके थे।

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