फ़िराक़ गोरखपुरी का व्यक्तित्व और कृतित्व देश की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और भाषा विन्यास को वसुधैव कुटुंबकम के समग्र अर्थ में प्रकट करता है। युवाओं को उनके व्यक्तित्व की सारगर्भित जानकारी देना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित बनवापुर में कायस्थ परिवार में जन्मे तथा भोजपुरी भाषा में पले-बढ़े थे, उर्दू भाषा के यह अज़ीम शायर। इनका असली नाम था रघुपति सहाय और बाद में फ़िराक़ उपनाम से लिखा। उनके पिता मुंशी गोरखप्रसाद ‘इबारत गोरखपुरी’ भी शायरी में दख़ल रखते थे। स्कूली शिक्षा गोरखपुर में हुई। इलाहाबाद विवि से 1918 में स्नातक की। फिर 10-12 वर्ष बाद 1930 में आगरा विवि से अंग्रेज़ी में एम.ए. की।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें डिप्टी कलेक्टर के लिए नामजद भी किया था, परंतु यह शायर भारत की स्वतंत्रता का परवाना भी था और इसी के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 6 दिसंबर 1920 को गिरफ्तार कर लिया, डेढ़ वर्ष का कारावास और जुर्माना भी लगाया। जेल में मुशायरा हुआ, तो उनके द्वारा ग़ज़ल पढ़ी गई। समाचार पत्र ‘जमींदार’ ने 3, 4 और 24 फरवरी, 3 मार्च, 4 मई, 1922 को रिपोर्ट प्रकाशित की। इस ग़ज़ल की बानगी :-
तमाम आलम-ए-इम्कां में आलम-ए-हू था
कोई नहीं था जिसे दिल पर अपने क़ाबू था
सितारा चर्ख से था टूट कर गिरा कोई
कि मुल्क-ए-हिंद की वह बेकसी आंसू था...
फ़िराक़ साहब ने क्रिश्चियन कॉलेज लखनऊ, सनातन धर्म कॉलेज कानपुर तथा 1930 से लेकर 1958 तक इलाहाबाद विवि में अंग्रेज़ी प्राचार्य के रूप में कार्य किया। बाद में यूजीसी ने बतौर नेशनल रिसर्च प्रोफेसर नियुक्त किया और वे 1966 तक काम करते रहे।
फ़िराक़ साहब के रचना संसार की एक झलक कुछ यूं है : गुल-ए-नग़मा, मश्अल, रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज़, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज़-ओ-कायनात, चिराग़ां, शोअला-ओ-साज़, हज़ार दास्तान, बज्म-ए-ज़िंदगी रंग-ए-शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधी रात, परछाइयां और तरान-ए-इश्क़ जैसी खूबसूरत नज़्में और सत्यम् शिवम सुंदरम् जैसी रुबाइयां। उन्होंने उपन्यास ‘साधु’ व कुटिया और कई कहानियां लिखी हैं। उर्दू, हिंदी व अंग्रेज़ी में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुईं।
फ़िराक़ गोरखपुरी को मिले प्रमुख सम्मान हैं-पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार।
फ़िराक़ की शायरी के कार्य को दो कालों में बांटा गया है : प्रारंभिक शायरी (1922-1940) और उसके बाद उनके जीवनकाल तक। उनकी शायरी में कई उर्दू शायरों-मोमिन, अमीर मीनाई और बाद में मीर, ग़ालिब, फ़ानी, हसरत मोहानी और यास का असर है। मसलन :
तेरी महफ़िल में तेरा और अंदाज़-ए-बयां होगा/झड़ेंगे फूल मुंह से और हुजूमे में बुलबुलां होगा। बहारे-गुल में मुझ पर मेहरबां जब बागबां होगा/रहूंगा मैं गुलों में, शाख़-ए-गुल पर आशियां होगा।
फ़िराक़ ने उर्दू के साहित्य के साथ-साथ हिंदी को भी अपने योगदान से समृद्ध किया। वहीं अंग्रेज़ी साहित्य का प्रयोग उर्दू और हिंदी भाषा में सुंदर ढंग से किया। विलियम ब्लेक के शे’र- टु सी ए वर्ल्ड इन ए ग्रेन ऑफ सैंड एंड हेवन इन ए वाइल्ड फ्लॉवर को फ़िराक़ ने लिखा :
जहां देखना है मिट्टी के एक रे़ज़े में/नमूद-ए-लाल-ए-ख़ुदरौ में देखना जन्नत।
फ़िराक़ ग़ज़लों के जरिये खुद के व संसार के दुख-सुख का वर्णन करते हैं :
...उम्र फ़िराक़ ने यूं ही बसर की/ कुछ ग़मे दौरां, कुछ ग़मे जानां।
शाम ही से गोश पर आवाज़ है बज्म-ए-सुखन
कुछ फ़िराक़ अपनी सुनाओ, कुछ ज़माने की कहो।
फ़िराक़ क्लासिकल ग़ज़ल के अंतिम और आधुनिक ग़ज़ल के पहले शायर थे। मूलत: फ़िराक़ ग़ज़ल के शायर हैं और उन्होंने शायरी की शुरुआत ग़ज़ल से ही की और अंत समय तक ग़ज़ल ही उनकी मनपसंद शायरी की शैली रही। मसलन,
‘ग़ौर से सुनना, मेरी शायरी में मेरी सदी बोलती है।’
फ़िराक़ उर्दू नज़्म के भी एक महत्वपूर्ण शायर हैं, जिन्होंने उर्दू नज़्म की परंपरा को न केवल बल दिया है, अपितु प्रयोग और विस्तार भी किए हैं। वहीं सन 1929 और 1945 के मध्य कही गई रुबाइयां विषय और शैली की दृष्टि से पारंपरिक रुबाइयां हैं, परंतु 1945 के बाद की रुबाइयां और निखर कर आती हैं और इनमें फ़िराक़ गोरखपुरी एक अलग जगह नज़र आते हैं। विषय और शैली की दृष्टि से फ़िराक़ ने उन रुबाइयों में हिंदुस्तानी सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने का सफल प्रयास किया। हिंदू देवमाला के विभिन्न नाम और घटनाओं के संदर्भ में वह देश की सर्वोत्तम आध्यात्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं का आभास दिलाते हैं। इसीलिए उन्होंने उन रुबाइयों को ‘मादरे हिंद’ के शीर्षक से अपने काव्य संग्रह में शामिल किया है।
नई दिल्ली में 3 मार्च, 1982 को यह भारतीय साहित्य जगत का सितारा अपनी अनंत यात्रा पर चला गया। 28 अगस्त, 1896 की तारीख़ फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से जानी जाती है, इसी दिन यह साहित्यिक विभूति दुनिया में आई थी।