चिंतक, लेखक एवं शिक्षाविद प्रो. अपूर्वानंद की पुस्तक ‘कविता में जनतंत्र’ प्रख्यात साहित्यकारों,विचारकों की कविताओं में लोकतंत्र के संस्थागत व नैतिक मूल्यों, उसके बुनियादी रूप व शक्ति का परिचय देती है। साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिनिधियों, उनकी गरिमा, वादों, विश्वासघात और आमजन के सपनों के धूल-धूसरित होने की व्यथा को भी उजागर करती है। दरअसल, इस पुस्तक में रघुवीर सहाय, धूमिल, कुंवर नारायण, नागार्जुन, विजय देव नारायण साही, जसिंता केरकेट्टा, श्रीकांत वर्मा, महमूद दरवेश, केदारनाथ सिंह, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, अशोक वाजपेयी, अनामिका, ओमप्रकाश वाल्मीकि, ज्ञानेन्द्रपति जैसे विद्वानों की संगृहीत कविताएं समाज के उस दर्द व आवाज को सामने लाती हैं जिन्हें हम नज़रअंदाज़ करते आए हैं।
यही नहीं, लोकतंत्र में घृणा की धारा की राजनीति की स्वीकारोक्ति कैसे आकर्षक हो जाती है और वह कैसे धर्म की चाशनी के ज़रिये इतने विशाल संख्याबल को अनुकूल बना लेती है तथा किस तरह जनता को बांटकर तंत्र पर कब्जा कर लेती है। कभी-कभी साधारण जन, किसानों-मज़दूरों, आदिवासियों की आवाज़ तंत्र के माध्यम से धनपतियों के हित में मंद कर दी जाती है।
जहां अधिकारों की प्राप्ति हेतु उठने वाली आवाज़ में प्राण देने वाले साहस का सवाल है, लेखक ने आशीष नंदी के कथन का उदाहरण दिया कि उन्हें उसकी खासी कीमत भी चुकानी पड़ी। दरअसल, जनतंत्र में जैसा दिखलाई पड़ता है, वैसा बोलने की खासी कीमत चुकानी पड़ती है। जनतंत्र में जनता द्वारा चुनी सरकार ऐसे कानून बनाती है जिससे जनता की शक्ति कम हो और उसकी ताक़त बढ़े। यह प्रवृत्ति अब हर देश में है।
वहीं कब जाति पर बात करना जातिवाद होता है और कब वह सांस्कृतिक गौरव—यह समझ से परे है। चिंतनीय है कि वह आईना जो अम्बेडकर ने मशक्कत के बाद दिया था, अब राष्ट्रवाद की भाप में धुंधलाने लगा है। सवाल है—कौन इसे मिटाएगा?
विद्वान लेखक अपूर्वानंद ने इस पुस्तक में कविताओं के माध्यम से भारतीय जनतंत्र की मौजूदा दशा और दिशा, आज़ादी के बाद हमने क्या खोया और क्या पाया, मौजूदा दौर में हम कहां खड़े हैं और इन स्थितियों में 2024 के चुनाव के दौर का जो खुलासा किया है, वह हमारी लोकतांत्रिक राजनीति के खोखलेपन का सबूत है। यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के एक-एक हिस्से के विद्रूप चेहरे और जनता द्वारा जनतंत्र के वायदे को बचाने की दिशा में किए संघर्ष की हकीकत सामने रखती है। मुक्तिबोध के शब्दों में—‘ब्रह्मांड में ये जो गतिपथ बने हुए हैं ग्रहों के, काश ऐसा होता कि वे उन्हें छोड़कर कहीं भटक जाते।’ जनतंत्र हमेशा ही नए गतिपथों की तलाश और अपने निर्धारित गति पथ या धुरी की सुरक्षा से मुक्ति का साहस करने का आमंत्रण है। यह पुस्तक उसका जीवंत स्वरूप है। यह पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।
पुस्तक : कविता में जनतंत्र लेखक : अपूर्वानंद प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 232 मूल्य : रु. 350.