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संवेदनशीलता और सृजन का संगम

पुस्तक समीक्षा
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प्रकाश मनु ऐसे कथाकार हैं जिन पर उनके विस्तृत रचनासंसार की वजह से लिखना अगर एक चुनौती है, तो दूसरी तरफ उनके व्यक्तित्व की सहजता का वर्णन करना किसी सौंदर्ययुक्त अभिव्यक्ति से कम नहीं। इस पुस्तक में मनु जी के लेखक बनने की कहानी, उनकी रचनाओं, कृतियों, साहित्य के प्रति प्रेम, संवेदनशीलता, सबका चित्रण किया गया है। लेखक ने समय-समय पर प्रकाश मनु से हुई मुलाकातों के माध्यम से उनके अनुभवों, जीवन की घटनाओं और खासकर उनके द्वारा सुनी अधकू की कहानियों को बहुत सरसता से इस पुस्तक में पिरोया है।

उनके जीवन की लंबी यात्रा को बहुत ही सादगी से, बिना किसी अलंकृत भाषा या क्लिष्ट शब्दों के, भावना के प्रवाह को गतिमान रखते हुए, लेखक ने लिखा है। कई भागों में विभक्त इस पुस्तक में मनु जी द्वारा बाल साहित्य की विविध विधाओं का उल्लेख विस्तार से किया गया है। उनकी कलम ने किस तरह बाल साहित्य को समृद्ध किया, यह इसके माध्यम से जाना जा सकता है। फिर चाहे वह बाल कविताएं हों या गीत, बाल कहानियां हों या उपन्यास अथवा नाटक, लेखक ने उनकी रचनाओं के कालक्रम के अतिरिक्त, वे कैसे लिखी हैं, यह भी उल्लेख किया है।

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साहित्य और पत्रकारिता में हमेशा कुछ नया करने की कोशिश में लगे प्रकाश मनु अपनी आज तक की साहित्यिक यात्रा के कल्पक रहे हैं। ‘गोलूभागा घर से’ उनका पहला बाल उपन्यास था। ‘एक थी ठुनठुनिया’ को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। उन्होंने साहित्य के अन्य साहित्यकारों के जीवन संघर्ष से प्रेरित होकर भी अपनी कहानियों की पृष्ठभूमि तैयार की है। विभिन्न कथा-प्रसंगों के माध्यम से इसमें रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र, देवेंद्र सत्यार्थी आदि के जीवन-छवियों की गहरी छाप भी देखी जा सकती है इस पुस्तक में। असल में यह पुस्तक किसी शोध ग्रंथ से कम नहीं है, जिसमें किस्सागोई द्वारा सरसता निहित की गई है।

पुस्तक : बाल मन के चितेरे प्रकाश मनु अविराम सृजन-यात्रा लेखक : अशोक बैरागी प्रकाशक : लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नयी दिल्ली पृष्ठ : 352 मूल्य : रु. 395.

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